इलाहाबाद, 11 फरवरी। हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कारोबारी निकांत जैन के खिलाफ अवैध वसूली और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े पूरे आपराधिक मामले को रद कर दिया है।
यह मामला प्रस्तावित सोलर पावर परियोजना की मंजूरी से संबंधित था, जिसमें कथित रूप से रिश्वत मांगने के आरोप लगाए गए थे। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जिससे प्रथमदृष्टया अपराध बनता हो। यह आदेश माननीय न्यायमूर्ति राजीव सिंह की एकल पीठ ने निकांत जैन की याचिका पर पारित किया।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि मामले में भारतीय न्याय संहिता तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कोई अपराध प्रथमदृष्टया बनता ही नहीं है। इसी के साथ न्यायालय ने 15 मई 2025 को दाखिल चार्ज शीट तथा 17 मई 2025 के तलबी आदेश को भी को निरस्त कर दिया।
अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया है कि शिकायत गलतफहमी के आधार पर दर्ज कराई थी। मामले की एफआईआर 20 मार्च 2025 को राजधानी के गोमती नगर थाने में दर्ज की गई थी, जो एक कंपनी के प्रतिनिधि की ओर से मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत पर आधारित थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि सोलर पावर परियोजना की मंज़ूरी के लिए परियोजना लागत की पांच प्रतिशत राशि रिश्वत में मांगी गई।
निकांत जैन की ओर से दलील गई दी कि आरोप अस्पष्ट, साक्ष्य विहीन और कारोबारी प्रतिद्वंद्विता व प्रशासनिक भ्रम का नतीजा है। यह भी तर्क दिया गया कि न तो कोई धनराशि दी गई, न कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभू सौंपी गई और न ही किसी प्रकार की धमकी देने की बात सामने आई है।
यह भी कहा गया कि विवेचना के दौरान नक्शा-नजरी नहीं बनाया गया और कथित एक करोड़ रुपये नकद की कोई बरामदगी भी नहीं हुई है। न्यायालय ने भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि अभियुक्त ने किसी लोक सेवक को अनुचित लाभ देने की पेशकश की हो।
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