जगदलपुर 23 मई। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ गठन के बाद से 2025 तक केवल 364 लोगों ने मतांतरण की आधिकारिक सूचना दी है। इस दौरान बस्तर में चर्च व प्रार्थना केंद्रों की संख्या डेढ़ हजार के पार पहुंच गई है। मतांतरण और डी- लिस्टिंग को लेकर बहस के बीच बस्तर में सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) से सामने आए आंकड़ों ने नई चर्चा छेड़ दी है।
सर्व आदिवासी समाज के जगदलपुर जिला अध्यक्ष दशरथ कश्यप ने आरटीआइ से प्रशासन से मतांतरण से संबंधित जानकारी मांगी थी। उपलब्ध कराए गए आंकड़े चौंकाने वाले हैं। नवंबर 2000 से फरवरी 2023 तक बस्तर में 364 लोगों ने ही मतांतरण की आधिकारिक सूचना प्रशासन को दी। वहीं, 2023-25 के बीच किसी ने भी मतांतरण की जानकारी प्रशासन को नहीं दी, जबकि यहां भारी संख्या में मतांतरण कराए गए हैं।
आंकड़ों के अनुसार, अजीत जोगी सरकार (2000-2003) के दौरान 232 लोगों ने मतांतरण की सूचना दी थी। तत्कालीन भाजपा शासनकाल (2004-2018) में यह संख्या 131 रही। पूर्ववर्ती कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में 2018 से फरवरी 2023 के बीच केवल एक व्यक्ति ने फरवरी 2020 में मतांतरण की जानकारी प्रशासन को दी। मतांतरण की सरकारी प्रक्रिया होती है, जिसे पूरा करना आवश्यक है। जनवरी 2023 से अब तक नारायणपुर समेत अन्य जिलों में सर्व आदिवासी समाज और मतांतरित लोगों के बीच मारपीट की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
अनुसूचित जाति की तरह जनजाति के लिए भी मतांतरण पर हो संवैधानिक बाध्यता
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के अध्यक्ष सत्येंद्र सिंह ने कहा है कि मतांतरण देश के लिए खतरा है और इसने आदिवासी इलाकों पर बुरा असर डाला है। इसके कारण गंभीर सामाजिक संघर्ष और विभाजन हुए हैं। उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद- 342 में संशोधन करके मतांतरण से जुड़ी कई समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, ताकि इस्लाम या ईसाई मत अपनाने वाले एसटी के लोगों को इस वर्ग के लाभ न मिले।

