आजकल मीडिया में एक खबर लगभग रोज ही पढ़ने को मिलती है कि फलां विभाग में होगी इतनी अधिकारियों और कर्मचारियों की भर्ती और इनमें लगभग सभी विभाग शामिल होते हैं। देश और प्रदेश के चौहमुखी विकास और प्रगति तथा समय से सभी योजनाएं पूरी हो इसके लिए कर्मचारियों और अफसरों का होना विभाग में जरुरी है। लेकिन यह भी पक्का है कि जब इन्हें रखा जाता है तो विभाग या सरकार का आर्थिक भार भी पड़ना तय है। इस बात को देखते हुए जनमानस में वर्तमान समय में एक बात जोरशोर से चल रही है कि जब विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों की भर्ती होती है तो फिर विकास कार्यों और योजनाओं की नीतियां बनाने और उससे पूर्व कार्यों की समीक्षा और जानकारियां जुटाने अर्द्धसरकारी या निजी एजेंसियों का इस नाम पर लिया जाता है कि योजना समय से गुणवत्तापूर्ण पूरी हो। इसलिए लाखों करोड़ों रुपये इन एजेंसियों को विभिन्न मंत्रालय द्वारा दिए जा रहे हैं। लेकिन जितना देखने सुनने को मिलता है उससे यही पता लगता है कि मौजूद अधिकारी काम से बचने के लिए एजेंसियों से अनुबंध कराते हैं विभिन्न नामों पर और बाद में इन एजेंसियों को दिए जाने वाले प्रोजेक्ट या तो फेल हो जाते हैं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। स्थानीय निकाय और नगर विकास के जो कार्यालय हैं उनमें इस प्रकार का भ्रष्टाचार चरम पर बताया जाता है। देखने में आता है कि सरकारी विभाग में कम्पूटर ऑपरेटरों और उनके जानकारों की तैनाती होती है फिर भी हर काम प्राइवेट एजेंसी से अनुबंध कर कंम्पयूटर जानकारों के माध्यम से कराए जाते हैं और आधी अधूरी जानकारी वाले इन युवाओं द्वारा तमाम कार्यों में गलतियां छोड़ी जाती है। ऐसा जहां ये तैनात है वहां आराम से देखा जा सकता है। आम आदमी की बात से हम भी सहमत हैं कि सरकार या तो विभागों में कर्मचारियों की तनख्वाह ना बढ़ाए और बढ़ाए तो प्राइवेट एजेंसियों से काम कराकर उनको मोटा भुगतान क्यों कराया जाता है। इससे दोहरी मार तनख्वाह भले ही सरकार और विभाग के माध्यम से मिलती हो लेकिन इसकी वसूली महंगाई या टैक्स बढ़ाकर ही अदा की जाती है जिससे जनता पर दोहरी मार आर्थिक रुप से पड़ रही है। उसके सपनों के अनुसार वो काम भी पूरे नहीं होते जिनका महिमामंडन इन एजेंसियों से अनुबंध के समय किया जाता है। वर्तमान में मीडिया में देखने को मिलता है कि फलां विभाग अपने यहां के योजनाओं के विस्तार अैौर सौंदर्यकरण के लिए उक्त एजेंसियों के संपर्क में है और फिर एजेंसियों को काम दे दिया जाता है। इस पर सवाल उठते रहे हैं। अगर उन्हें भी नजरअंदाज कर दिया जाए तो सरकारी विभागों में नियुक्ति या ठेके पर काम कराना सही नहीं और सरकार इसे सही मानती है तो कर्मचारियों और अधिकारियों की तैनाती क्यों की जाती है। मेरा मानना है कि केंद्र के संबंधित विभाग को जनहित में व्यापक स्तर पर विचार विमर्श और समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट देकर इस दोहरे खर्च पर रोक लगवाने का कार्य करे। क्योंकि वर्तमान में आम आदमी इस अतिरिक्त भार को झेलने की स्थिति में नहीं है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
Trending
- मुंबई: महिला डॉक्टर से मारपीट करने वाले शिवसेना पार्षद ने किया सरेंडर, हाई कोर्ट ने एक दिन पहले ही रद की थी जमानत
- लोन पास कराने के नाम पर रिश्वत मांगने वाला जालसाज सीबीआई के हत्थे चढ़ा, आगरा से किया गिरफ्तार
- हाथरस : पत्नी से डरे पति का आया हैरान करने वाला मामला, आठ दिन से घर में है बंद, बचाने की लगा रहा गुहार
- मेरठ में 357 करोड़ का टैक्स रिफंड घोटाला: 3000 क्लाइंट्स को दिलाए अवैध Refund, 50 लाख के जेवर और 4 करोड़ की FD सीज
- हिमाचल में मौसम का रेड अलर्ट: 20-21 जुलाई को अत्यधिक भारी बारिश का खतरा, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड की चेतावनी
- कोर्टरूम में रील बनाने वाले वकीलों पर होगी कार्रवाई, बार काउंसिल के सर्कुलर में और क्या-क्या?
- सीएम योगी बोले- ललिता गौतम हत्याकांड के दोषी बचेंगे नहीं, परिवार से मुलाकात की, 5 लाख की मदद, आवास देंगे
- क्या एक शादी करने वाले को ही मप्र में रहने का कानूनी अधिकार होगा यह असंभव है
