एक जमाना था कि अपने देश में किक्रेट से ज्यादा बच्चे हॉकी खेला करते थे। और उन्हें समाज से भी भरपूर प्रोत्साहन मिलता था। हॉकी के पितामह ध्यानचंद जिन्होंने इस खेल को अपने जीवन में चर्म पर पहुंचाया था वो हॉकी में रूचि रखने वालों के लिए अत्यंत सम्मानजनक थे। भले ही आज हॉकी इतनी लोकप्रिय न हो मगर इसके खिलाड़ी कम या ज्यादा पूरे देश के गली मौहल्लों में देखने को मिल जाएंगे। अपने शुरूआती दौर में एक खबर के अनुसार सबसे पहले हॉकी जमी हुई बर्फ पर खेली जाती थी। जिसे आईस हॉकी कहते थे। 3 मार्च 1875 को कनाडा में पहली बार इंडौर आईस हॉकी मैच मॉन्ट्रियल विक्टोरिया स्केटरिंग में हुआ था। तो इसे आधुनिक हॉकी का जनक माना जाता है। बताते है कि खेलने की जगह कम होने के चलते पहली बार इसकी टीमों में 9-9 खिलाड़ी तय किये गये थे उस समय इस खेल को काफी खतरनाक माना जाता था। क्योंकि बर्फ पर गेंद का नियंत्रण मुश्किल होता था। लकड़ी के सपाट टुकड़ो डिस्क पर पहली बार खेली गई बंद कमरे में। खेल के दौरान खिलाड़ियों के बीच वर्तमान की भांति मनमुटाव और विवाद होने की बात भी सामने आती है। लेकिन यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी। खेलों के इतिहाकारों के जानकारों का कहना है कि उस समय इस खेल को देखने मात्र 40 दर्शक आये थे। वर्तमान में अपने देश में यह खेल कई प्रदेशों में बहुत लोकप्रिय है अभी भी। तथा खेला खूब जाता है और मजे की बात यह है कि किक्रेट की लोकप्रियता के साथ ही यह खेल भी अमेरिका यूरोप में भी लोकप्रिय हो रहा है। खेल तो खेल होता है लेकिन जब अपने देश में पाकिस्तानी टीम से हमारे खिलाड़ी खेलते है तो उसका अनुभव अलग होता है क्योंकि मैंच के शुरूआत से अंतिम दौर तक जो जिज्ञासा उभरती है उसमें दर्शक इसे पूरी तौर पर सबकुछ भुल कर देखते है।
हॉकी की लोकप्रियता के लिए कोई काम न हो रहा हो ऐसा नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि सरकार को इसे बढ़ावा देने के लिए कुछ और प्रयास करने के साथ ही जीतकर या अच्छा प्रर्दशन कराने वाले खिलाड़ियों को किक्रेट खिलाड़ियों की भांति इन्हें भी जो सुविधाएं व आर्थिक सहायता दी जा रही है उसमें बढ़ोत्तरी हो। तथा जिस प्रकार से हॉकी के आईपीएल मैंच होते है उनकी शुरूआत बड़े बड़े उद्योगपतियों व्यापारियों और फिल्मी हस्तियों द्वारा अपनी टीमें गठित कर अपने देश के इस प्राचीन व महत्वपूर्ण खेल को बढ़ावा देने की भरपूर कोशिश और प्रयास हो यही संकल्प आज इसके स्थापना दिवस के मौके पर हम लें सकते है। इसके साथ ही इसके जो नामचीन खिलाड़ी ध्यानचंद जैसे है उनके नाम पर पुरस्कार और नकद राशि देने की भी शुरूआत हो जाए तो इस खेल के लिए स्वर्णीम उपलब्धि होगी।
(प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए व पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड उप्र सरकार पत्रकार व संपादक)
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