वैसे तो नगर निगम अधिकारियों के दावों को अब नागरिक गंभीरता से नहीं लेते हैंं क्योंकि केंद्र व प्रदेश सरकारों द्वारा जनहित के मामलों के निस्तारण और सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सहायता निगम को उपलब्ध कराई जाती है लेकिन इसके अफसर अपने वादे पूरे करने में लगभग असफल ही रहते हैं। हो सकता है मेरी सोच गलत हो लेकिन आम आदमी कह रहा है आज समाचार पत्रों में खबर पढ़ी कि नगरायुक्त का कहना है कि शहर में प्रमुख सड़कों की दिन रात होगी सफाई। ११९ किमी सड़कों से दो शिफ्टों में कूडा उठेगा। अफसर कह रहे है तो हो सकता है यह बात सही हो जाए तो यह अच्छा फैसला है। इसके लिए कई सड़कों को छांटा गया है। सफाई का काम ठेके पर कराने की तैयारी चल रही है। बताते हैंं कि शहर को स्वच्छता रैंेिकंग में शीर्ष पर लाने से यह काम प्राथमिकता से निजी कंपनियों को सौंपा जाना है। इच्छुक कंपनियों से प्रस्ताव मांगे गए हैं। एक समाचार के अनुसार ११०० मीट्रिक टन कूड़ा उत्पादित होता है। सुबह शाम सफाई के नाम पर एक करोड़ रूपये हर माह खर्च किए जाने की बात चल रही बताई जाती है। नगरायुक्त जी अगर ऐसा होकर भी स्वच्छता रैंकिंग में अपना शहर आ जाए और स्मार्ट सिटी में हमारे शहर की भी चर्चा हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता जहां १०० करोड़ रूपये पहले भी खर्च होते रहे हैं तो साल में १२ करोड़ यह भी सही।
अभी तक जो समस्याएं हम झेल रहे हैँ उसमें कैसे गुजारा कर रहे हैं यह तो नागरिक ही जानते हैं क्येांकि कुछ अफसरों द्वारा जो दावे कर सब्जबाग दिखाए जाते हैं वो टूटने पर मानसिक आघात लगता है और कितने उससे उबर भी नहीं पाते। नगरायुक्त जी एक दावा था कि ऐप से सूचना मिलने पर तुरंत कूड़ा उठेगा लेकिन नागरिकों के अनुसार ऐसा नहीं हो र हा। इसलिए अगर आप एक करोड़ रूपये खर्च कर भी सफाई करा सकते हैं तो बहुत अच्छा है वरना नागरिकों को मुंगेरी लाल के सपने ना दिखांए तो अच्छा है। जैसे पहले आप दावे करते रहे और बजट खर्च होता रहा लेकिन नागरिकों के अनुसार काम कहीं होता नजर नहीं आता। इसका यह हाल होगा तो ठीक नहीं है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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