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    Home»देश»समान नागरिक संहिता के एक वर्ष पूर्ण होने पर उत्तराखंड में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों का उत्सव
    देश

    समान नागरिक संहिता के एक वर्ष पूर्ण होने पर उत्तराखंड में न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों का उत्सव

    adminBy adminJanuary 27, 2026No Comments4 Views
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    देवभूमि उत्तराखंड से उठी यह प्रेरणा संपूर्ण राष्ट्र के लिए प्रकाशपुंज बने :स्वामी चिदानन्द सरस्वती
    ऋषिकेश, 27 जनवरी।
    देवभूमि उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता के ऐतिहासिक एक वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर, परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी को कोटि-कोटि साधुवाद एवं मंगलकामनाएँ दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल एक प्रशासनिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा, सांस्कृतिक समरसता और नैतिक दृढ़ता का जीवंत उद्घोष है।
    समान नागरिक संहिता लागू कर उत्तराखण्ड ने एक ऐसा अध्याय लिखा, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बना, जिसने समान नागरिक संहिता लागू किया। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संविधान के अनुच्छेद 44 के क्रियान्वयन की दिशा में एक सशक्त पहल है।

    पूज्य स्वामी जी ने कहा कि समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन न्याय और समानता के उस मूल भाव को साकार करता है, जो हमारे संविधान की आत्मा है और सनातन संस्कृति की चेतना में रचा-बसा है। यह पहल बताती है कि कानून तब सबसे प्रभावी होता है, जब वह करुणा, समता और गरिमा के साथ समाज के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और संरक्षण प्रदान करे।
    देवभूमि से उठी यह गूंज केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है; यह एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को सुदृढ़ करती है। समान नागरिक संहिता का एक वर्ष पूर्ण होना इस बात का प्रमाण है कि साहसिक नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और जन-विश्वास के साथ किए गए निर्णय समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह निर्णय विभाजन नहीं, बल्कि समावेशन का संदेश देता है, जहाँ आस्था का सम्मान भी है और समान नागरिक अधिकारों की दृढ़ स्थापना भी।
    पूज्य स्वामी जी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की सनातन परंपरा सदैव समता और संतुलन की पक्षधर रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना तभी फलित होती है, जब समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो और सभी के लिए न्याय समान रूप से उपलब्ध हो। समान नागरिक संहिता इस भाव को आधुनिक विधिक ढांचे में प्रतिष्ठित करती है, जहाँ व्यक्ति की गरिमा सर्वाेपरि है।
    समान नागरिक संहिता का सफल एक वर्ष संवाद, संवेदनशीलता और सशक्तिकरण का परिणाम है। यह कानून नारी शक्ति के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक समरसता और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। इससे समाज में विश्वास का वातावरण निर्मित होता है और युवा पीढ़ी को यह संदेश मिलता है कि राष्ट्र निर्माण में समान अवसर और समान उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं।

    माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में उत्तराखंड ने यह दिखाया है कि दृढ़ संकल्प के साथ लिए गए निर्णय न केवल संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना को भी नई ऊर्जा देते हैं। यह पहल बताती है कि विकास और मूल्य, दोनों साथ चल सकते हैं। प्रशासनिक दक्षता और आध्यात्मिक दृष्टि का यह संगम समाज को नई दिशा प्रदान करता है।

    पूज्य स्वामी जी ने कहा कि यह एक वर्ष साहस, संकल्प और संस्कार का प्रतीक है। साहस, क्योंकि परिवर्तन के लिए दृढ़ निर्णय आवश्यक होते हैं; संकल्प, क्योंकि दीर्घकालिक प्रभाव के लिए निरंतरता चाहिए; और संस्कार, क्योंकि कानून तब ही स्थायी बनता है, जब वह नैतिकता से अनुप्राणित हो। समान नागरिक संहिता का यह वर्ष इन तीनों का सशक्त प्रमाण है।
    स्वामी जी ने कहा कि समान नागरिक संहिता की यह यात्रा आगे भी न्याय, करुणा और समरसता के पथ पर निरंतर आगे बढ़े। देवभूमि उत्तराखंड से उठी यह प्रेरणा संपूर्ण राष्ट्र के लिए प्रकाशपुंज बने और भारत को नैतिक नेतृत्व, सामाजिक संतुलन और संवैधानिक सुदृढ़ता की नई ऊँचाइयों तक ले जाए। आज की परमार्थ गंगा आरती उत्तराखंड़ के सतत विकास और समृद्धि हेतु की समर्पित।

    उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता के ऐतिहासिक एक वर्ष पूर्ण होने के पावन अवसर पर, परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश से पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी को कोटि-कोटि साधुवाद एवं मंगलकामनाएँ दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल एक प्रशासनिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा, सांस्कृतिक समरसता और नैतिक दृढ़ता का जीवंत उद्घोष है।
    समान नागरिक संहिता लागू कर उत्तराखण्ड ने एक ऐसा अध्याय लिखा, जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में उत्तराखण्ड देश का पहला राज्य बना, जिसने समान नागरिक संहिता लागू किया। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और संविधान के अनुच्छेद 44 के क्रियान्वयन की दिशा में एक सशक्त पहल है।

    पूज्य स्वामी जी ने कहा कि समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन न्याय और समानता के उस मूल भाव को साकार करता है, जो हमारे संविधान की आत्मा है और सनातन संस्कृति की चेतना में रचा-बसा है। यह पहल बताती है कि कानून तब सबसे प्रभावी होता है, जब वह करुणा, समता और गरिमा के साथ समाज के प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार और संरक्षण प्रदान करे।
    देवभूमि से उठी यह गूंज केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है; यह एक भारत, श्रेष्ठ भारत की अवधारणा को सुदृढ़ करती है। समान नागरिक संहिता का एक वर्ष पूर्ण होना इस बात का प्रमाण है कि साहसिक नेतृत्व, स्पष्ट दृष्टि और जन-विश्वास के साथ किए गए निर्णय समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह निर्णय विभाजन नहीं, बल्कि समावेशन का संदेश देता है, जहाँ आस्था का सम्मान भी है और समान नागरिक अधिकारों की दृढ़ स्थापना भी।

    पूज्य स्वामी जी ने यह भी रेखांकित किया कि भारत की सनातन परंपरा सदैव समता और संतुलन की पक्षधर रही है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना तभी फलित होती है, जब समाज में किसी के साथ भेदभाव न हो और सभी के लिए न्याय समान रूप से उपलब्ध हो। समान नागरिक संहिता इस भाव को आधुनिक विधिक ढांचे में प्रतिष्ठित करती है, जहाँ व्यक्ति की गरिमा सर्वाेपरि है।
    समान नागरिक संहिता का सफल एक वर्ष संवाद, संवेदनशीलता और सशक्तिकरण का परिणाम है। यह कानून नारी शक्ति के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक समरसता और पारदर्शिता को बढ़ावा देता है। इससे समाज में विश्वास का वातावरण निर्मित होता है और युवा पीढ़ी को यह संदेश मिलता है कि राष्ट्र निर्माण में समान अवसर और समान उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं।

    माननीय मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी जी के नेतृत्व में उत्तराखंड ने यह दिखाया है कि दृढ़ संकल्प के साथ लिए गए निर्णय न केवल संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना को भी नई ऊर्जा देते हैं। यह पहल बताती है कि विकास और मूल्य, दोनों साथ चल सकते हैं। प्रशासनिक दक्षता और आध्यात्मिक दृष्टि का यह संगम समाज को नई दिशा प्रदान करता है।

    पूज्य स्वामी जी ने कहा कि यह एक वर्ष साहस, संकल्प और संस्कार का प्रतीक है। साहस, क्योंकि परिवर्तन के लिए दृढ़ निर्णय आवश्यक होते हैं; संकल्प, क्योंकि दीर्घकालिक प्रभाव के लिए निरंतरता चाहिए; और संस्कार, क्योंकि कानून तब ही स्थायी बनता है, जब वह नैतिकता से अनुप्राणित हो। समान नागरिक संहिता का यह वर्ष इन तीनों का सशक्त प्रमाण है।

    स्वामी जी ने कहा कि समान नागरिक संहिता की यह यात्रा आगे भी न्याय, करुणा और समरसता के पथ पर निरंतर आगे बढ़े। देवभूमि उत्तराखंड से उठी यह प्रेरणा संपूर्ण राष्ट्र के लिए प्रकाशपुंज बने और भारत को नैतिक नेतृत्व, सामाजिक संतुलन और संवैधानिक सुदृढ़ता की नई ऊँचाइयों तक ले जाए। आज की परमार्थ गंगा आरती उत्तराखंड़ के सतत विकास और समृद्धि हेतु की समर्पित।

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