आज हम विश्व टीबी रोग दिवस मना रहे हैं। जहां तक मुझे लगता है कि इसका आश्य क्षय रोग को जड़ से समाप्त करना होता है। कुछ सालों में इसमें काफी सुधार भी हुआ है। लेकिन इतने साल हो गए। घर घर अभियान चलाकर सर्वे कराया जाता है। सरकार इलाज की सुविधा दे रही है तो वो क्या कारण है कि अभी भी टीबी के मरीज मिल जाते हैं। इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि पूर्व में टीबी का नाम सुनते ही लोगों की रुह कांपने लगती थी तो यह सोचकर की कहीं उन्हें यह रोग ना लग जाए सब बीमार से दूर भागते थे। अब ऐसा नहीं है क्योंकि अब टीबी लाइलाज रोग नहीं रहा। अगर इसकी सही प्रकार से मॉनिटरिंग की जाए और बीमार नियमानुसार दवाई लेकर जांच कराता रहे तो जानकार बताते हैं कि सौ दिन में यह बीमारी ठीक हो जाती है और भविष्य में इसके होने की संभावनाएं भी कम हो जाती हैं।
लेकिन सरकार के इतने प्रयास सामाजिक संगठनों की कोशिश और परिवारों के ध्यान देने के बाद भी अभी तक टीबी रोग खत्म क्यों नहीं हो पाया। सही गलत तो जानकार बता सकते हैं लेकिन इसका इलाज महंगा होता है क्योंकि खानपान पर काफी जोर दिया जाता है। असरदार व्यक्ति अगर है तो उसकी देखभाल सरकारी अस्पतालों व निजी में हो जाती है मगर आम आदमी की सही देखभाल सरकारी नौकरशाह और चिकित्सक नहीं करते और टीबी की बीमारी से छुटकारे के लिए सरकार जो आर्थिक मदद करती है वो इतनी भी नहीं होती कि उससे एक माह का इलाज कराया जा सके। जिम्मेदारों का कहना है कि पिछले साल टीबी के लक्षणों के मरीजों को ढूंढने के काफी प्रयास किए गए सर्वे किए गए। लेकिन कहां हुए यह शायद किसी को पता नहीं है क्योंकि जितना मुझे पता है मेरे किसी जानकार के यहां ऐसा कोई आदमी नहीं पहुंचा जो इसका सर्वे कर रहा हो। मेरा मानना है कि सरकार इसके इलाज के लिए आर्थिक सहायता बढ़ाए और डॉक्टरों को यह हिदायत हो कि किसी मरीज को नजरअंदाज ना किया जाए। दवाईयां नहीं है तो पात्रों को उपलब्ध कराई जाए और मरीज को किसी सामाजिक संगठन या बड़े उद्योगपति को जिम्मेदारी दी जाए कि वह इसके इलाज की व्यवस्था करे। इसके अलावा अगर सार्वजनिक कार्यक्रमों व स्कूलों में टीबी के लक्षण और उसके समाधान से अवगत कराया जाए तो इस समस्या का काफी समाधान हो सकता है। आजकल बच्चे जैसे ही समझदार होते हैं तो उसके द्वारा ऐसे लोगों की मदद करने की इच्छाएं ज्यादा होती है। बच्चे मां बाप से कहकर इस बीमारी से पीड़ितों का इलाज करा सकते हैं। शिक्षा के नाम पर दुकान चलाने वाले कुछ स्कूलों को दो चार टीबी मरीजों की जिम्मेदारी दी जाए कि वो उनका इलाज कराए। इस व्यवस्था से टीबी जड़ से खत्म हो सकती है। यह बात विश्वास से कही जा सकती है। बस आवश्यकता इस बात की है कि कुछ सेंटर बनाकर डॉक्टरों व दवाईयों की व्यवस्था बनाकर बीमारी से बचाव के टीके उपलब्ध रहें और मीडिया के माध्यम से इसका प्रचार प्रसार कराया जाए तो मरीज बीमारी से ठीक हो सकते हैं। वरना तो कोई ना कोई दिवस रोज ही है। गंदगी और प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के लिए यह व्यवस्था भी जरुरी है कि संपन्न लोगों की मदद ली जाए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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