अभी खाने की थाली की बढ़ी कीमत से संबध्ंा खबर को नागरिक भूला भी नहीं पाए कि चाय की कीमत बढ़ने के नाम पर अमूल दूध और पंजाब में वेरका ने भी दूध के दाम बढ़ा दिए। महंगाई बढ़ रही है इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन एक तरफ सरकार चाहे वह किसी की भी हो कुछ लोगों को विभिन्न तरीके से मुफ्त की रेवड़ियां बांटने में कोई कमी नहीं कर रहा है कोई बिजली मुफ्त देने की बात करता है तो कोई राशन या पैसे डलवाने की बात करता है। इन लोकलुभावने वादों को पूरा करने के प्रयास भी होते हैं। ऐसेे में दूध की कीमत बढ़ाना सही नहीं कह सकते। पहली बात तो यह कि सरकारी और अर्द्धसरकारी दुग्ध संस्थानाओं को अपने अफसरों व रखरखाव के खर्चे कम कर चारे का इंतजाम करना चाहिए ना कि दूध के दाम बढ़ाकर हर आदमी को आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जाए। यह कहने में कोई हर्ज नहीं करता हूं कि जिस प्रकार इमरजेंसी में शादी में आमंत्रितों की संख्या तय कर दी गई थी और मिठाई व पकवान परोसने पर रोक लगाई गई थी और हलवाईयों की दुकान पर दूध से बने व्यंजन बिकने पर रोक लगी थी तो ऐसा ही कदम सरकार अब उठाकर दूध व अन्य चीजों की महंगाई रोकने के लिए प्रयास करे। क्योंकि दूध ऐसी वस्तु है जो अमीर गरीब व्यापारी कर्मचारी सभी के काम आता है। और इसके रेट बढ़ने से साधन संपन्न लोगों पर कोई असर ना पड़े लेकिन गरीब आदमी पर दो रुपये किलो बढ़ना सही नहीं है। क्योंकि अगर वो २५० ग्राम भी दूध लेता है तो १५ रुपये महीना का खर्च बढ़ता है जो उसका बजट प्रभावित करने में काफी है। इसलिए दूध दही के दर बढ़ाने की बजाय मिठाईयां रसगुल्ले आदि पर रोक लगाई जाए और जिस प्रकार इमरजेंसी में इसकी रोकथाम के उपाय किए जाते थे वो किए जाएं लेकिन यह ध्यान रखा जाए कि आम आदमी महंगाई झेलने की स्थिति में नहीं है क्योंकि जितनी महंगाई बढ़ चुकी है उसके हिसाब से कमाई नहीं बढ़ रही है और ना ही असंगठित क्षेत्रों में काम करने वालों की आय में बढ़ोत्तरी हो रही है ऐसे में खाने पीने की चीजों में बढ़ोत्तरी आम आदमी के ऊपर मानसिक और आर्थिक अत्याचार ही कहा जा सकता है। सही तो यह हो कि महंगाई के कारणों मुफ्त उपहार देना, अफसरों व जनप्रतिनिधियों को नित नई सुविधाएं रोक दी जाए तो इसमें कोई परेशानी नहीं होगी।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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