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    Home»देश»अवैध भवनों में खुले बैंक और सर्वर डाउन तथा कर्मचारियों की कमी बताकर उपभोक्ता का उत्पीड़न सही नहीं, आम आदमी के लिए बनी योजनाओं का उसे मिले पूरा लाभ
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    अवैध भवनों में खुले बैंक और सर्वर डाउन तथा कर्मचारियों की कमी बताकर उपभोक्ता का उत्पीड़न सही नहीं, आम आदमी के लिए बनी योजनाओं का उसे मिले पूरा लाभ

    adminBy adminMay 15, 2026Updated:May 15, 2026No Comments18 Views
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    देश के हर व्यक्ति गरीब हो या अमीर साक्षर हो या निरक्षर उसे समाज की मुख्य धारा में बने रहने और आर्थिक समस्याओं का समाधान ढूंढने के एक मानवीय दृष्टिकोण से केन्द्र सरकार और वित्त मंत्रालय के द्वारा अनेक प्रकार के उपाय करने के साथ ही सुझाव दिए जा रहे हैं आर्थिक रूप से कमजोर और अनपढ़ व्यक्तियों के खाते खुलवाने के लिए जीरो बैंलेंस और बैंकों में अधिकारी तैनात किये गये हैं छोटो उद्योग लगाने और बेसहारा लोगों को सर पर छत और व्यापार के लिए पैसा आसानी से उपलब्ध हो इसके लिए भी कई कानून प्रचलन में हैं लेकिन देश में आयी संचार क्रांति के माध्यम से सरकार देश वासियों को जो सुविधाएं हर प्रकार की उपलब्ध कराने हेतु प्रयासरत है ज्यादातर मामलों में इनका लाभ अभी पात्रों को नहीं मिल पा रहा है हां इसकी आड़ में अपने चापलूसों और किसी भी प्रकार का लाभ पहुंचाने वालों को ज्यादातर बैंककर्मियों द्वारा किसी न किसी रूप में लाभांवित करने की बात सुनने को मिलती है और ऐसे अधिकारी और कर्मचारियों को जेल भी भेजा जाता है और उनकी नौकरी भी ले ली जाती है क्योंकि आखिर में जाकर दोषियों के विरूद्ध क्या कार्यवाही हुई इसका खुलासा ना हो पाने से पात्रों को ठेंगा दिखाने और चापलूसों को उपकृत करने की प्रथा बढ़ती ही जा रही है।
    केन्द्रीय वित्त मंत्रालय और रिर्जव बैंक के अफसर नागरिकों का बैंकों में जमा पैसा उनके बाद उनके आश्रितों को दिलाने आदि के लिए केवाईसी जैसे अभियान चला रही है तो दूसरी ओर बैंकों में तैनात कुछ लोग जिंदा लोगों की भी केवाईसी करने में नाकों चने चबा रहे है सरकार ने काला धन निकालने जैसी योजनाओं को विस्तार देने के लिए बैंकिंग लेनदेन के लिए कई उपाय किये हैं मगर हर समय वेतन बढ़ाने और सुविधाएं व छुट्टियां मांगने वाले कई कर्मचारी व अधिकारी इन्हें लागू नहीं होने दे रहे हैं ऐसा अनेक मौकों पर देखने और सुनने को मिलता है। क्योंकि कभी कर्मचारी न होने तो कभी सर्वर ठप होने के नाम पर आम आदमी को मानसिक और समाजिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है क्योंकि अगर जरा सी भी कमी रही तो उसे नियमों में फंसा दिया जाता है और अपनी गलती का पटाक्षेप यह कहकर कर दिया जाता है कि यह तो तकनीकी है या कर्मचारी नहीं आए तो हम क्या कर सकते हैं। इसी प्रकार सरकार गरीबों और जरूरतमंदों को लोन देकर उन्हें हर प्रकार से समर्थ बनाने की योजनाएं चला रही है मगर जिम्मेदार जब चाहे देख सकते हैं कि कई बैंकों के मैनेजर लोन देने वाले अधिकारी या बाबू गरीब और कमजोरों को तो परेशान करते हैं और अपने पिछलग्गूओं को भरपूर सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं इसके जीते जागते उदाहरण के रूप में बैंक ऑफ बड़ौदा के अधिकारियों ने गलत तरीके से साउथ एशिया के एक प्रदेश में अपात्रों को लोन दिया जिसके परिणाम स्वरूप बैंक की शाखा और मुख्यालय में दोनों में ही ताले डालने पड़ गये ऐसे किस्से और भी बहुत सुनने को मिल सकते हैं।
    आजकल एक नई व्यवस्था से बैंकों के उपभोक्ता दो-चार हो रहे हैं जिसमंे पीड़ितों के अनुसार 80 हजार से कम के भुगतान के नोटों की मशीन से गिनती होगी और उससे ज्यादा काउंटर पर वैसे ही जमा हो जाएंगे। गिनती कोई गलत नहीं है लेकिन इस नाम पर जो परेशान किया जाता है उससे आम आदमी कई बार देखने को मिला कि बैंक जाने से घबराने लगे हैं कारण अवैध रूप से बने भवनों में फर्जी एनओसी मकान मालिक और जिम्मादार विभाग के कुछ अफसरों से मिलकर लगाकर बैंक ऐसे ऐसे निर्माणों में खोल दिये जाते हैं जहां लेनदेन के बारे में अपना इंतजार में गर्मी बारिश और सर्दी में बिना किसी शेड के सड़क पर खड़ा होना पड़ता है।
    अभी पिछले दिनों देश में कुछ अवैध निर्माणों में खुले बैंक चिकित्सालयों और दुकानों पर सील लगा दी गयी। तब यह अफरा तफरी मची की ऐसे भवनों की तलाश हो जहां ऐसी स्थिति का समाना ना करना पड़े इस काम में लगे एजेंट सक्रिय भी हो गए मगर कुछ बैंक इस संदर्भ में कोई कदम उठाने को तैयार नहीं है क्योंकि जगह के मालिक और बैंक के मैनेजर की मधुरता अन्य जगह बैंक ले जाने में बाधा बनी हुई है। जानकारों के अनुसार वैसे तो 100 में से 95 हर तरह के बैंक अवैध निर्माणों में खुले हुए हैं लेकिन मेरठ के थाना सदर बाजार के क्षेत्र सब्जी घास मंडी में एक घरेलू मकान में स्टेट बैंक की शाखा खुली है जहां ना उपभोक्ताओं के खड़े होने की जगह है और ना ही बैठने की। सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है उपर से नोट गिनने सर्वर डाउन होने नेट ना चलने सब की जिम्मेदारी उपभोक्ता पर ही डालकर उन्हें परेशान किया जा रहा है।
    केन्द्रीय वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक आम आदमी की सुविधा के लिए बड़े-बड़े कदम उठा रहे हैं। बैंकिंग से जुड़ना भी हर व्यक्ति का भी ठीक हैं लेकिन बैंक और कर्मचारियों की गलती और उपभोक्ता को परेशान करने की नियत सरकार व वित्त मंत्रालय की सभी जनहित की योजनाओं पर पानी फेरने में लगे हुए हैं आम बैंक इस उपभोक्ता के इस कथन से हम भी सहमत है कि सरकार या तो नई तकनीकी पूर्ण रूप से लागू करे और योजनाएं बनाई जा रहीं है उनका लाभ सरलता से पात्रों को मिल सके यह सुनिश्चित किया जाये वरना सर्वर डाउन होने और कर्मचारियों की कमी और नोटों की गिनती की योजनाओं को सरल बनाया जाये और नियमानुसार बने भवनों में खुले जहां आने वाले उपभोक्ताओं को बरसात सर्दी गर्मी से राहत हो और पीने पानी की सुविधा उपलब्ध हो सके। बैंकिंग व्यवस्था से सब को जोड़ा जाना एक अच्छी व्यवस्था है मगर उसमें किसी भी प्रकार से बाधा पहुंचाने वालों को बख्शा नहीं जाना चाहिए।
    बैंक में उत्पन्न उपभोक्ताओं की समस्याएं
    प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए व पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार

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