गर्मी और लू आजकल अपने पूरे शबाब पर है। आगामी जून जुलाई अगस्त सितंबर अगर सावधानी ना बरती गई तो काफी कष्टदायक हो सकते हैं क्येांकि जितना महसूस करा है उससे आभास हुआ कि अप्रैल मई जून तो गर्मी पड़ती है वो इतना परेशान नहीं करती जितना जुलाई अगस्त सितंबर में होने वाली उमस से परेशानी होती है। कोरोना काल में ऐसी ही समस्याएं उत्पन्न हुई थी जिनमें सांस फृलना और घुटना प्रमुख थी। ऐसा ही उमस में गरीब तो आसानी से झेल लेता है क्योंकि वह गर्मी सर्दी बरसात में काम करता है तो उसकी इम्यूनिटी मजबूत हो जाती है लेकिन मध्यम दर्जे का व्यक्ति जिसे जमीनी श्रम कम करना पड़ता है इसलिए यह उसम उसके लिए भारी होती है। जहां तक बड़े लोगों की बात है बीमारी तो उनका भी पीछेा नहीं छोडती लेकिन एसी कमरों में रहकर दवाई खाकर वह सुरक्षित रहते हैं। इसलिए मेरा मानना है कि अब अपनों के साथ साथ अपना भी पूरी तौर पर ध्यान रखें क्योंकि कितने लोग अपने परिवार के प्रति इतना समर्पित रहते हैं कि खुद को कुछ भी हो जाए लेकिन अन्यों को कुछ नहीं होना चाहिए। ऐसे चक्कर में कभी कभी ना तो वो अपनों को सही रख पाते हैँ ना खुद को क्योंकि खुद कमजोर होता रहेगा तो अपनों का ध्यान कैसे रखेगा। इसलिए मेरा मानना है कि किसी भी परेशानी या बीमारी को यह सोचकर ना दबाएं कि इस पर खर्च होगा और परिवार की देखभाल कम हो जाएगी। जब भी बैचेनी परेशानी महसूस हो तो अपने शरीर की सुने वो क्या चाहता है। अपने प्रति नरमी बरतें और जरुरी बातो का ध्यान रखें। आवश्यकता पड़ने पर परिवार की सलाह ले सकते हैं मगर अपने और दूसरों के लिए कुछ सीमाएं तय करनी होगी क्योंकि यह स्वार्थ नहीं है। अगर खुद ठीक रहोगे तो औरों का भी ध्यान रख सकते हो। ऐसे में कौन क्या कहेगा अपने भी नाराज हो सकते हैँ इसका ध्यान ना कर सिर्फ यह तय करना होगा कि भगवान इतनी ताकत दीजिए कि खुद को सुरक्षित रखूं और औरों का ध्यान रख पाउं। इससे आप अपराध बोध का शिकार नहीं होगें और आसपास का माहौल खुशनुमा होगा। हमारे अपनों को भ्ीा अपना कर्तव्य ध्यान रहे और अपनों के लिए कर गुजरेन की भावना का गलत अर्थ लगाकर कामचोर ना हो जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए उनसे भी भरपूर काम और अपनी सेवा कराने में पीछे नहीं रहना चाहिए क्योंकि कोई भी परिवार में सब कुछ करेंगे तब वह आगे बढ़़ेगा और उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास होगा। मेरा मानना है कि मौसम कोई भी हो जितना काम खुद करते हैं उतना काम परिजनों को करने के लिए मजबूर करें इससे बुजुगों की देखभाल के साथ पौष्टिक भोजन उपलब्ध करा सकते हैं। इस बात का ध्यान रखते हुए प्रभु भजन और सेवा में चूकना नहीं चाहिए। क्योंकि जितना अपने कर सकते हैं उससे ज्यादा दूसरे तैयार नजर आते हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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