नई दिल्ली, 26 मार्च (जा)। सुप्रीम कोर्ट ने गत दिवस आधिकारिक कार्यक्रमों और स्कूलों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ के गायन से संबंधित गृह मंत्रालय के परिपत्र के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि यह निर्देश अनिवार्य नहीं है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने मोहम्मद सईद नूरी द्वारा दायर याचिका को समय से पहले दायर की गई याचिका बताया और इसे भेदभाव की अस्पष्ट आशंका पर आधारित करार दिया। अदालत ने कहा कि दि कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है या नोटिस दिया जाता है तब कोर्ट आइए।
नूरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, लेकिन यदि लोगों को उनके धर्म और आस्था की परवाह किए बिना यह गीत गाने के लिए बाध्य किया जाता है, तो कुछ लोगों को यह मजबूरी लग सकती है।
जस्टिस बागची ने हेगड़े से कहा कि हमें बस ऐसा लगता है कि आपको भेदभाव को लेकर कुछ अस्पष्ट आशंकाएं हैं, जिनका सर्कुलर से कोई स्पष्ट संबंध नहीं है। साथ ही उन्होंने पूछा कि क्या परिपत्र में राष्ट्रगीत नहीं गाने पर किसी दंडात्मक परिणाम का उल्लेख है या क्या किसी व्यक्ति को इसे नहीं गाने के कारण सभा से निकाला गया है।
हेगड़े ने कहा कि व्यवधान डालने की स्थिति में दंड का प्रविधान है। भले ही कोई कानूनी दंड न हो, लेकिन जो कोई इसे गाने या इसके गायन के दौरान खड़ा होने से इन्कार करता है, उस पर हमेशा अत्यधिक दबाव होता है।
क्या लोगों को परामर्श की आड़ में यह गीत गाने के लिए बाध्य किया जा सकता है? इस पर सीजेआइ ने हेगड़े से सवाल किया कि क्या याचिकाकर्ता को किसी को राष्ट्रगीत गाने के लिए बाध्य करने संबंधी कोई नोटिस भेजा गया है।
जस्टिस बागची ने कहा कि केंद्र सरकार के निर्देश में किया जा सकता है कहा गया है। यह स्वतंत्रता जितनी राष्ट्रगीत गाने की है, उतनी ही उसे नहीं गाने की भी है।
पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि यदि कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है या उसे कोई नोटिस दिया जाता है तो वह अदालत का रुख कर सकता है। पीठ ने कहा कि फिलहाल यह याचिका भेदभाव की अस्पष्ट आशंका से अधिक कुछ नहीं है।
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