मुंबई, 18 जुलाई (ता)। हिंदी फिल्म जगत में अपने अभिनय से लोगों को दीवाना बनाने वाले अभिनेता तो कई हुए और दर्शकों ने उन्हें स्टार कलाकार माना, लेकिन सत्तर के दशक में राजेश खन्ना पहले ऐसे अभिनेता के रूप में अवतरित हुए, जिन्हें दर्शकों ने ‘सुपरस्टार’ की उपाधि दी। पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर, 1942 को जन्मे जतिन खन्ना उर्फ राजेश खन्ना का बचपन से ही फिल्मों की ओर रुझान था और वह अभिनेता बनना चाहते थे, हालांकि उनके पिता इस बात के सख्त खिलाफ थे। राजेश खन्ना ने अपने करियर के शुरुआती दौर में रंगमंच से जुडक़र अभिनय की बारीकियां सीखीं। बाद में उन्होंने यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेंट कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया, जिसमें वह प्रथम चुने गए।
राजेश खन्ना ने अपने सिने करियर की शुरुआत वर्ष 1966 में चेतन आनंद की फिल्म ‘आखिरी खत’ से की। वर्ष 1966 से 1969 तक वह फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। राजेश खन्ना के अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत की क्लासिकल फिल्म ‘आराधना’ से चमका। बेहतरीन गीत-संगीत और शानदार अभिनय से सजी इस फिल्म की गोल्डन जुबली सफलता ने राजेश खन्ना को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। ‘आराधना’ की सफलता के बाद वह शक्ति सामंत के प्रिय अभिनेता बन गए। बाद में शक्ति सामंत ने उन्हें कई फिल्मों में काम करने का अवसर दिया, जिनमें ‘कटी पतंग’, ‘अमर प्रेम’, ‘अनुराग’, ‘अजनबी’, ‘अनुरोध’ और ‘आवाज’ प्रमुख हैं। फिल्म ‘आराधना’ की सफलता के बाद राजेश खन्ना की छवि रोमांटिक हीरो के रूप में बन गई। इसके बाद निर्माता- निर्देशकों ने उनकी इसी रूमानी छवि को अपनी फिल्मों में खूब भुनाया। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए और उन्हें हिंदी फिल्म जगत के पहले सुपरस्टार होने का गौरव प्राप्त हुआ। यूं तो उनके अभिनय के सभी कायल थे, लेकिन खास तौर पर टीनएज लड़कियों के बीच उनका क्रेज कुछ ज्यादा ही देखने को मिला। एक बार जब राजेश खन्ना बीमार पड़े तो दिल्ली के कुछ कॉलेज की छात्राओं ने उनके पोस्टर पर बर्फ की थैली रखी, जिससे उनका बुखार जल्द उतर जाए। इतना ही नहीं, उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि कई प्रशंसक उन्हें खून से प्रेम पत्र लिखा करती थीं। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना पर यह आरोप लगने लगे कि वह केवल रोमांटिक भूमिकाएं ही निभा सकते हैं। निर्माता- निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें इस छवि से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ में उन्होंने हास्य अभिनय कर दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दिया। इसी वर्ष प्रदर्शित ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्म ‘आनंद’ में राजेश खन्ना के अभिनय का नया रंग देखने को मिला। इस फिल्म में उन्होंने एक गंभीर और भावनात्मक किरदार निभाया। फिल्म में उनका संवाद बाबूमोशाय हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों से बंधी हुई है३ दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ और आज भी याद किया जाता है। वर्ष 1969 से 1976 के बीच अपने सुनहरे दौर में राजेश खन्ना ने जिन फिल्मों में काम किया, उनमें से अधिकतर बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं। हालांकि अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद हिंदी सिनेमा में बदलाव आया और रोमांटिक फिल्मों के इस सुपरस्टार की लोकप्रियता धीरे-धीरे कम होने लगी। उनकी कई फिल्में असफल रहीं।
अभिनय में आई एकरूपता से बचने और खुद को चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित करने के लिए राजेश खन्ना ने अस्सी के दशक में विभिन्न तरह की भूमिकाएं निभाईं। वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म ‘रेड रोज’ में उन्होंने नकारात्मक किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया। वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘अलग-अलग’ के जरिए राजेश खन्ना ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा। उनके सिने करियर में अभिनेत्री मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया। राजेश खन्ना को अपने फिल्मी करियर में तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्मों में कई यादगार भूमिकाएं निभाने के बाद राजेश खन्ना ने समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया। वर्ष 1991 में वह कांग्रेस के टिकट पर नई दिल्ली लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। अपने चार दशक लंबे सिने करियर में राजेश खन्ना ने करीब 125 फिल्मों में अभिनय किया। रोमांस के जादू से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले और हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार कहलाने वाले राजेश खन्ना 18 जुलाई, 2012 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।
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