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    Home»देश»नाबालिग को रखा वयस्क कैदियों के साथ, सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, यूपी सरकार पर 5 लाख का जुर्माना
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    नाबालिग को रखा वयस्क कैदियों के साथ, सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख, यूपी सरकार पर 5 लाख का जुर्माना

    adminBy adminApril 22, 2026No Comments3 Views
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    आगरा 22 अप्रैल। सुप्रीम कोर्ट ने एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि नाबालिग को वयस्क(बालिग) कैदियों के साथ जेल में रखना कानून और मानवाधिकार दोनों का उल्लंघन है। यह मामला आगरा की केंद्रीय जेल से जुड़ा है, जहां एक बच्चे को गलत तरीके से वयस्क कैदियों के बीच रखा गया था। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह बच्चों के अधिकारों की रक्षा में सिस्टम की बड़ी विफलता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब किसी व्यक्ति को नाबालिग घोषित कर दिया गया हो, तब भी उसे वयस्क जेल में रखना बेहद चिंताजनक है।

    मीडिया रेपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की घटना संचार की कमी, लापरवाही और असंवेदनशील रवैये को दर्शाती है। अदालत के अनुसार, यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।

    क्या है पूरा मामला?
    घटना के समय आरोपी नाबालिग था, लेकिन इसके बावजूद उसे आगरा की केंद्रीय जेल में वयस्क कैदियों के साथ रखा गया। यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक मानी गई। इस मामले के सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया और राज्य सरकार से जवाब मांगा। जांच में यह साफ हुआ कि संबंधित अधिकारियों की लापरवाही के कारण यह गलती हुई। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पीड़ित नाबालिग को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का फैसला किया है। यह कदम उस मानसिक और शारीरिक नुकसान की भरपाई के तौर पर देखा जा रहा है, जो बच्चे को झेलना पड़ा।

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत किसी भी नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ नहीं रखा जा सकता। भारत में बच्चों के लिए अलग सुधार गृह और देखभाल की व्यवस्था की गई है, ताकि उन्हें सुरक्षित माहौल मिल सके और उनका पुनर्वास हो सके।

    अदालत ने कहा कि इस तरह की घटना न केवल बाल संरक्षण कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ भी है। बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकता है।

    पूरे देश के लिए जारी हुआ SOP
    इस मामले को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित रहने के बजाय पूरे देश के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने और उसे सभी राज्यों में लागू करने का निर्देश दिया है।

    कोर्ट ने कहा कि यह जरूरी है कि भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न हो। साथ ही, सभी राज्यों को इस SOP का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले पर निगरानी बनाए रखेगी, ताकि आदेशों का सही तरीके से पालन हो।

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