मुंबई, 11 जून (ता)। कुछ फिल्में मनोरंजन करती हैं, कुछ प्रेरित करती हैं, और फिर कुछ ऐसी होती हैं जो क्रेडिट्स खत्म होने के बाद भी आपके साथ बनी रहती हैं। वे आपको सोचने, आत्ममंथन करने और उन सच्चाइयों का सामना करने पर मजबूर करती हैं जिनसे अक्सर लोग बचना चाहते हैं। बंदर’ ऐसी ही फिल्मों की श्रेणी में आती है। साल की सबसे चर्चित और सराही गई फिल्मों में से एक, बॉबी देओल अभिनीत यह फिल्म अपनी दमदार कहानी, शानदार अभिनय और कानूनी तथा जेल व्यवस्था की कठोर वास्तविकताओं को बेबाकी से प्रस्तुत करने के कारण चर्चा का केंद्र बनी हुई है। प्रशंसित फिल्मकार अनुराग कश्यप के निर्देशन और निर्माता निखिल द्विवेदी के समर्थन से बनी यह फिल्म एक ऐसा सिनेमाई अनुभव प्रदान करती है जो जितना रोमांचक है, उतना ही सोचने पर मजबूर करने वाला भी है।
फिल्म के केंद्र में हैं बॉबी देओल, जिन्होंने समर के किरदार को असाधारण गहराई के साथ जीवंत किया है। कभी लोकप्रिय अभिनेता और पॉप-कल्चर आइकन रहा समर अब अपनी घटती पहचान और निजी जीवन की जटिलताओं से जूझ रहा है। उसकी दुनिया तब पूरी तरह बदल जाती है जब वह एक झूठे मामले में फँस जाता है और घटनाओं की एक ऐसी श्रृंखला शुरू होती है जो उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदल देती है। बॉबी देओल ने इस किरदार की उलझन, बेबसी, गुस्सा, संवेदनशीलता और टूटन को बेहद ईमानदारी और प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है। यह उनके करियर के सबसे बेहतरीन और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली प्रदर्शनों में से एक माना जा सकता है। ‘बंदर’ को और अधिक असरदार बनाता है अनुराग कश्यप का निर्देशन अपनी कच्ची और यथार्थवादी कहानी कहने की शैली के लिए मशहूर कश्यप एक बार फिर ऐसे विषय पर लौटते हैं जो उनकी पहचान रहा है। फिल्म की कहानी सख्त, तीव्र और पूरी तरह बांधे रखने वाली है। समर की यात्रा के माध्यम से कश्यप झूठे मुकदमों, न्याय व्यवस्था की जटिलताओं और जेलों के भीतर कैदियों को झेलनी पड़ने वाली कठोर परिस्थितियों को सामने लाते हैं। फिल्म यह दिखाती है कि व्यवस्था की खामियों की कीमत इंसानों को किस तरह चुकानी पड़ती है, जहाँ न्याय अक्सर देर से मिलता है और तब तक कई ज़िंदगियाँ अपूरणीय रूप से बदल चुकी होती हैं। कई मायनों में यह फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’के बाद संस्थागत व्यवस्थाओं पर अनुराग कश्यप की सबसे तीखी और प्रभावशाली टिप्पणी महसूस होती है।
निर्माता निखिल द्विवेदी भी ऐसी कहानी का समर्थन करने के लिए विशेष प्रशंसा के पात्र हैं, जो दिखावे से अधिक सार्थकता को महत्व देती है। ‘बंदर’ साहसी, बेबाक और सामाजिक रूप से प्रासंगिक सिनेमा का उदाहरण हैऐसा सिनेमा जो दौर में कम देखने को मिलता है। यह फिल्म कठोर सच्चाइयों को उजागर करते हुए भी दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़े रखती है और साबित करती है कि सशक्त कहानी कहने की कला आज भी गहरा प्रभाव छोड़ सकती है। ‘बंदर’ सिर्फ साल की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक नहीं है, बल्कि ऐसी फिल्म है जो देखने के बाद लंबे समय तक आपके ज़ेहन से निकलती नहीं।
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