हर कोई चाहता है कि उसके लिए सुविधाएं घोषित की जाए या योजनाएं बनाई जाए वो पूरी हो क्योंकि ऐसा ना होने से बयानबाजी से जो सपने नागरिक देखने लगते हैं वो जब पूरे नहीं हो तो इच्छाओं पर होने वाले तुषारापात होना किसी के लिए झेलना आसान नहीं है।
चुनाव का दौर हो या सामान्य माहौल बड़ी घोषणाएं बयान देने और सपने दिखाने के मामले में कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता ऐसा मीडिया की खबरों से साफ हो रहा है। जो करने में सक्षम है वो कुछ कहे तो यह सोचने में अच्छा लगता है कि शायद कुछ माहौल में बदलाव हो। और जनहित के काम शुरू हो जाएं। लेकिन असली कठिनाई तो तब होती है जब कोई व्यक्ति पावर के नाम पर जीरो लेकिन बड़े लोगों की देखादेख खुले मंच से घोषणाएं करते हैं वो ज्यादा कष्टदायक है। कोई कहता है कि हम इतने लोगों को मुफ्त इलाज देंगे, खाना देंगे आपदा में मदद करेंगे लेकिन ऐसा कहने वाले गधे के सिर से सींग की भांति ऐसे गुम होते हैं कि उन्हें ढूुंढना मुश्किल होता है। सही तो यह है कि घोषणाकर्ता कुछ कर सकते हो तो ही बोले वरना मीडिया में चर्चित रहने के लिए घोषणा मंत्री ना बने क्योंकि ऐसे लोगेां द्वारा दिखाए गए सपने जब टूटते हैं तो सुविधा की उम्मीद करने वाला टूट जाता है और कितने ही तनाव का शिकार होकर परेशानी को पाल बैठते हैं जिसे सही नहीं कहा जा सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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