देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सरकारी पैसे का हर क्षेत्र में सदुपयोग हो इसके लिए प्रयास कर रहे हैें और नागरिकों को जागरूक भी। सरकार चेतावनी देती रही है कि काम में लापरवाही और पैसे का दुरुपयोग नहीं होने देगी और ऐसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी। मगर पता नहीं क्या कारण है कि ज्यो ज्यो दवा की मर्ज बढ़ता ही गया के समान विकास के लिए दिया जानेवाले पैसा सही प्रकार से शायद उपयोग नहीं किया जा रहा वरना किसी भी निर्माण की समयावधि से पूर्व वो टूटता है तो ठेकेदार की जिम्मेदारी उसे सही कराने की होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो उसे ब्लैकलिस्ट किया जाए। इस सबके बावजूद देश के ज्यादातर हिस्सों में सड़कें बनती हैं नेता उदघाटनकरते हैं और आवभगत के नाम पर सरकारी पैसे का उपयोग भी किया जाता है लेकिन जब समय से पहले उसमें गडढे होते हैं तो विभागीय अधिकारी व जनप्रतिनिधि इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। हर साल प्रदेशों के मुख्यमंत्री गडढामुक्त सड़क का संदेश देते हैं और समय निर्धारित किया जाता है लेकिन यह सब समय से पूरा नहीं होता। और पैसे की बर्बादी कर दी जाती है क्योंकि समय पर काम पूरा नहीं किया जाता। हम बात करें नदियों पर बने पुलों की तो एक खबर के अनुसार बिहार में गंगा पर बने निर्माणाधीन पुल का गिरना, यूपी में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे की सड़कों का कई स्थानों पर बैठ जाना आदि मुददे ढूंढने पर दस साल के कई दर्जन मिल जाते हैं लेकिन घटना होने पर थोड़ा बवाल मचता और बाद में यह चर्चा गायब हो जाती है। फिलहाल नया मामला उत्तराखंड का सामने हैं। यहां देहरादून में नंदा की चौकी के पास टोंस नदी पर १६ करोड़ की लागत से बने पुल के एक हिस्सा उदघाटन के १६ दिनों बाद ही धराशायी हो गया। और कहा जा रहा है कि मानसूनी बारिश की भेंट चढ़ गया। पहाड़ी राज्यों के साथ साथ मैदानी इलाकों में भी बाढ़ और आपदाएं आना मामूली बात है। पहाड़ों में तो हर साल ऐसी घटनाएं मानी जाती है तो फिर 16 ही दिन में १६ करोड़ से बने पुल का हिस्सा धराशायी कैसे हो गया। क्योंकि ना भूस्खलन हुआ और ना नदी में बाढ़ आई जो पुल को गिरा देती। अब उत्तराखंड के सीएम द्वारा इस घटना की जांच के आदेश दिए गए हैं। हमेशा ही ऐसा होता रहा है लेकिन इससे किसकी जवाबदेही तय हुई और किसको सजा मिली इसका खुलासा कब होगा यह भगवान ही जाने। अन्य मामलों की तरह इस पुल का मामला भी फाइलों में दबकर ना रह जाए। नई पीढ़ी भी देखती है कि पुराने समय के पुल १०० साल तक अडिग खड़े रहते है। हर आपदा का मुकाबला करते हैं लेकिन हिलते नहीं लेकिन नई सड़कों और पुलों में वह जान क्यों नहीं है यह तो विशेषज्ञ ही जान सकते हैं लेकिन यह कहा जा सकता है कि निर्माण के ठेके में बनी नियमावली का पालन अफसरों व ठेकेदारों की मिलीभगत से नहीं हो पाता और सस्ते लोहे और घटिया सामग्री लगाकर मानकों के विपरीत पुल और सड़क बना दी जाती है जो इतने समय भी नहीं टिकती कि उसके उदघाटन का समय भूल पाए। मेरा माननाहै कि पुल सड़कें या इमारते किसी घटना का शिकार होती है तो इनकी जांच कराई जाए और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई हो और नुकसानकी वसूली उनके निजी संपत्ति से कर जेल भेजा जाए क्योंकि अब समय आ गया है कि ईमानदारी से प्रयास करने वाली सरकार की भावनाओं को नजरअंदाज कर ऐसे कार्यों पर रोक लगे उपयोग करो और फेंको वाला रवैया अब नहीं होना चाहिए। क्योंकि ऐसी किसी घटना में किसी अपने कीजान जाती है तो उसके लिए यह जीवनभर का दुख हुआ और सरकार के भी बजट का काफी हिस्सा बनाने और मुआवजे देने में खर्च होता है। पीएम साहब अगर ऐसे मामलों में सही कार्रवाई नहीं होगी तो अभी तो १६ दिनों में ४६ करोड़ से बना पुल टूटा है भविष्य में इससे भी कम समय में ऐसा हो सकता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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