मेरठ, 30 जुलाई (दैनिक केसर खुशबू टाइम्स)। भारतीय योग संस्थान मेरठ इकाई ने स्थान सरस्वती शिशु मंदिर में सुबह 5.00 से 6.30 तक सर्वप्रथम दीप प्रज्वलन प्रांतीय प्रधान रवीद्र सिंह चौहान, जिला,प्रधान सुनील राघव, विपिन चौहान, यशपाल शर्मा आदि अधिकारी उपस्थित रहे। दीप प्रज्वलन किया, पश्चात सरस्वती वंदना श्रीमती संजुला राघव, श्रीमती शीमा तोमर। गायत्री मंत्र श्रीमती पुष्पा गोदियाल आसनों में ताड़ासन अर्ध चक्रासन, उष्ट्रासन, शशकासन, वक्रासन, धनुरासन, शवासन, आसान आदि कराये गए। प्राणायाम में अनुलोम विलोम, चंद्रभेदी प्राणायाम, कपालभाति, भ्रामरी और इन सबके लाभ बताए गए। श्री केपी मलिक, विनय सोम, ललित शर्मा, राकेश शर्मा, शिवकुमार, शंभू दयाल वर्मा, श्री जय भगवान सिंघल, श्री बृजपाल सिंह, श्री अरुण, श्रीमती निर्मला, श्रीमती उषा वर्मा, श्रीमती शोभा गोसाई, श्रीमती नीतू सिंह। भजन श्रीमती उषा वर्मा, श्रीमती दीपा, श्रीमती अनीता दहिया, श्रीमती बबीता राघव, श्रीमती अंजू रिहान गीत के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रान्तीय प्रधान रविंद्र सिंह चौहान ने प्रकाश लाल जी के जीवन पर प्रकाश डाला। आपका जन्म 1 मार्च 1920 पाकिस्तान सरगोधा में हुआ था।
सन 1947 में 70,000 हिंदुओं को भारत में विभिन्न परिस्थितियों में लाए और 10 अप्रैल 1967 को भारतीय योग संस्थान की स्थापना की और जिओ और जीवन दो का नारा दिया। आज भारत में 4500 योग केंद्र चल रहे हैं, 11 विदेशों में योग के निशुल्क चल रहे हैं। आपका उद्देश्य जन जन तक योग पहुंचने का लक्ष्य रहा है। आप अनुशासित व्यक्ति रहे, ओजस्वी वाणी सादा जीवन चेहरे पर सदा मुस्कान तेजस्वी व्यक्तित्व जिसने अपने आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। कठिनाइयों के सामने घुटने नहीं टेके धैर्य और संयम का साथ कभी नहीं छोड़ा।
मुश्किल का डटकर सामना किया न केवल सामना किया, अपितु विजय होकर निकले कठिनाइयों की अग्नि में उनका व्यक्तित्व कुछ और निखर कर आया।
खुद पिता की संरक्षण की छाया के अभाव में पले बड़े पर जब अधिकारी प्रशिक्षण के लिए आश्रम में आते तो कहते यह तुम्हारा मायका है ,कितने भी दिन का प्रशिक्षण हो कितने भी अधिकारी आश्रम में रहे उन सब की रहने खाने सीखने की सारी व्यवस्था हमेशा ही निशुल्क होती है कोई धनराशि का सहयोग करने की बात करता तो कहते कि मायके में रहकर जब बेटी विदा होती है तो क्या अपने रहने खाने का खर्च देती है और खुद गेट पर खड़े होकर सबको विदा करते उनके होठों पर तो बाल सुलभ मुस्कान होती पर जाने वालों की आंखों में अश्रु वह श्रद्धा से उनके चरणों में अपना सर झुकाना चाहते या स्पर्श करना चाहते तो भी तुरंत मना कर देते और पलट कर इस व्यक्ति के पास छूने लगते कितनी महान सोच थी उनकी श्रद्धेय प्रकाश लाल जी आदर्शों की नींव रखी उन पर सिद्धांतों का भवन बनाया और स्वयं उन आदर्शों को अपनाया ऐसे महापुरुष को शत-शत नमन यही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।

