नई दिल्ली 18 जुलाई। देश में जल्द प्लास्टिक के नोटों की शुरुआत होने जा रही है। पहले 10 और 20 रुपये के छोटे नोट से ट्रायल किया जाएगा, उसके बाद बड़े पॉलिमर नोट चलन में लाए जाएंगे।
भारतीय रिजर्व बैंक ने पॉलिमर नोटों की छपाई की दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसके लिए सुरक्षा विशेषताओं से युक्त पॉलिमर शीटों के निर्माण एवं आपूर्ति हेतु वैश्विक टेंडर आमंत्रित किया गया है। पॉलिमर सामग्री में कई आधुनिक सुरक्षा फीचर होंगे, जिनमें पारदर्शी विंडो पर चित्र, धातु वाला अंक, चुंबकीय सुरक्षा धागा, शैडो इमेज और इरिडिसेंट पैटर्न शामिल हैं। कागज के 10 और 20 के मौजूदा नोटों का जीवन चक्र काफी छोटा होता है। बड़ी संख्या में नोट प्रिंटिंग के बाद एक वर्ष में खराब होकर दोबारा मुद्रण के लिए आते हैं।
यदि पॉलिमर नोटों का ट्रायल सफल रहता है तो भविष्य में कई अन्य मूल्यवर्ग के नोटों के लिए भी बड़े स्तर पर खरीद की जाएगी। आरबीआई से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगले तीन से छह महीने में पॉलिमर नोट की शुरुआत होगी। उसके बाद एक साल तक ट्रायल चलेगा।
दुनिया के करीब 60 देशों में प्लास्टिक नोट इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले शुरुआत की थी। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, न्यूजीलैंड जैसे कई देशों ने भी इन्हें अपनाया। हालांकि, भारत में इससे पहले भी ऐसा प्रयास हो चुका है।
प्लास्टिक नोटों में सुरक्षा के ज्यादा मजबूत इंतजाम किए जा सकते हैं। इनकी नकल बनाना आसान नहीं होगा। इससे फर्जी नोटों की समस्या पर भी काफी हद तक रोक लग सकती है।
नोटों की छपाई को लेकर कड़े नियम तय किए गए
बोली लगाने वाली कंपनियों का चीन या पाकिस्तान से कारोबार भारत से जुड़े काम से अलग हो।
कंपनी चीन और पाकिस्तान से कच्चा माल नहीं खरीद सकतीं।
भारत से सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों के लिए उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग से मंजूरी लेना अनिवार्य।
प्लास्टिक नोटों के फायदे
सबसे बड़ा फायदा इनकी लंबी उम्र है.
ये कागज के नोटों की तुलना में ढाई से चार गुना ज्यादा चल सकते हैं.
ये पानी से जल्दी खराब नहीं होते आसानी से फटते नहीं हैं और गंदगी भी कम पकड़ते हैं.
कई शोधों में पाया गया है कि इनकी सतह पर बैक्टीरिया भी कम टिकते हैं. सबसे अहम बात इनकी पारदर्शी विंडो और आधुनिक सुरक्षा फीचर इन्हें नकली बनाना बेहद कठिन बना देते हैं.
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
पॉलिमर नोट शुरू में महंगे पड़ते हैं क्योंकि इनके लिए खास मटेरियल चाहिए जिसे फिलहाल विदेशों से खरीदना पड़ सकता है.
देशभर के ATM और नोट गिनने वाली मशीनों को भी नए नोटों के हिसाब से अपग्रेड करना पड़ सकता है.
भारत जैसे गर्म देश में अत्यधिक तापमान का असर भी एक चुनौती माना जाता है. इसके अलावा कई देशों में लोगों ने शिकायत की है कि नए पॉलिमर नोट आपस में चिपक जाते हैं और मोड़ने पर उन पर स्थायी सिलवट पड़ जाती है.
दुनिया में कहां-कहां चलते हैं पॉलिमर नोट?
ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में सबसे पहले पॉलिमर नोट शुरू किए और बाद में पूरी करेंसी बदल दी गई.
इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई समेत 40 से ज्यादा देशों ने इन्हें अपनाया. इन देशों का अनुभव बताता है कि शुरुआत में लागत ज्यादा होती है, लेकिन लंबे समय में नोट ज्यादा टिकाऊ साबित होते हैं.

