बचपन में गांव में बुजुर्गों से सुना जाता था कि सबकुछ तेरा है कोठी कुठलों को हाथ मत लगाना यह किवदंती वर्तमान में अगर ध्यान से सोचें तो हमारे ग्राम प्रधानों पर लगभग सही उतरती है। क्योंकि पंचायत चुनाव होने में अब समय लगेगा। इसलिए सरकार ने प्रधानों की मांग को मानकर उनका कार्यकाल बढ़ाकर उन्हें प्रशासक का दर्जा दे दिया। लेकिन नीतिगत मामलों में फैसला लेने के अधिकार से दूर रखा। जैसे अब किसी पक्षी से उड़ने को कहे और उसके पंख काट दे वैसे ही नागरिकों की चर्चा के अनुसार इस फैसले में नजर आता है। यह जरुर है कि ग्राम प्रधानों को भी प्रशासक के रुप में कुछ माह तक प्रधान की कुर्सी पर बैठने का अवसर प्राप्त हो गया है क्योंकि आगे कौन जीतेगा यह कोई नहीं कह सकता।
मांग यह भले ही प्रधानों की रही हो लेकिन सरकार ने भी आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए ग्राम प्रधानों को आगामी विधानसभा चुनावों में अपने समर्थन में काम करने के लिए एक निर्णय किया है। कल क्या होगा यह तो समय ही बताएगा लेकिन नागरिकों की यह बात सही है कि प्रधानों को शान शौकत का अवसर कुछ माह के लिए बढाकर सत्ताधारी दल ने अपने साथ जोड़ने का सफल प्रयास किया है। इस बात को लेकर पक्ष विपक्ष और आम आदमी में चर्चाएं चल रही है। मैं तो सिर्फ यह कह सकता हूं कि एक आदमी बाल कटाने गया और बोला कि मेरे सिरपर कितने बाल है। नाई बोला कुछ मिनट रुक जाओ सब पता चल जाएगा। इसी तरह प्रधानों को दिए मौके का कितना फायदा सत्ताधारी दल को हो पाएगा यह चुनाव बाद ही पता चल पाएगा। नीतिगत आधार पर फैसला ना लेने कर रोष अगर प्रधानों ने विपक्ष की ओर कर दिया तो यह सोच धरी रह जाएगी। यह बात मुझे भी ठीक लगती है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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