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    Home»देश»सेवातीर्थ और लोकभवन जनसमस्याओं का हो समाधान जैसे शब्द सकारात्मक माहौल बनाते हैं, हुजूर अफसरों के किले बनते जा रहे आफिसों के गेट भी खुलवाएं
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    सेवातीर्थ और लोकभवन जनसमस्याओं का हो समाधान जैसे शब्द सकारात्मक माहौल बनाते हैं, हुजूर अफसरों के किले बनते जा रहे आफिसों के गेट भी खुलवाएं

    adminBy adminDecember 3, 2025No Comments4 Views
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    अधिकारी प्राथमिकता से निपटाएं जनसमस्याएं नागरिकों से करें विनम्र व्यवहार सदभावना वातावरण में सुनें उनकी बात अब पीएमओ का नाम सेवा तीर्थ राज्यपालों के अधिकारिक आवास राजभवन भी लोकभवन कहलाए जाएंगे जैसे शब्दों की खबरों को पढ़कर और नेताओं के बयानों का अवलोकन कर रामराज्य की अनुभूति होने लगती है क्योंकि लगता है कि जब इतने बड़े पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों और मंत्रिमंडल में लिए गए फैसलों की जानकारी जनप्रतिनिधियों द्वारा दी गई है तो उसका असर भी होता नजर आएगा।
    मैं किसी भी निर्णय या बयान की आलोचना नहीं कर रहा हूं क्योंकि यह इतनी अच्छी सोच है कि अगर लागू हो जाए तो हर व्यक्ति आर्थिक और अन्य समस्याओं के बीच भी खुशी से जीवन यापन करने की सोच सकता है। कुछ वर्ष पूर्व मेरठ के डीएम और वर्तमान में प्रमुख सचिव पशुपालन एवं डेयरी विभाग मुकेश मेश्राम अपने सहयोगियों को सलाह देते थे कि जब कोई अपनी परेशानी लेकर आए तो उससे हंसते हुए मिलो जिससे वह अपनी बात कहकर जाए और उसमें कोई रोष ना रहे। आईएएस डीके सिंह जब मेरठ में नगरायुक्त थे तो अपने कार्यालय का गेट हर व्यक्ति के लिए खुला रखते थे और अब एमएसपी कमेटी के चेयरमैन और वर्ल्ड बैंक के डायरेक्टर संजय अग्रवाल अपने कार्यकाल में अगर उनसे कोई मिलना आया तो मिलकर बात सुनते थे। अगर कोई फोन करता था तो चर्चा किया करते थे या बाद में फोन करते थे। यूपी के डीजीपी रहे जयएन चतुर्वेदी कहा करते थे कि पुलिस कर्मियों की समस्याओं के समाधान के साथ आम आदमी की समस्याएं सुनी जानी चाहिए और कोशिश करते थे कि जनता की बात सुनी जाए। लेकिन वर्तमान में तो सरकार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के स्तर से प्रयास के बावजूद नागरिकों की समस्याओं के समाधान नहीं हो रहे हैं। हर व्यक्ति की समस्याएं होती है इसलिए यह तो नहीं कहना चाहिए कि वह २४ घंटे जनता दरबार लगाकर बैठ जाए लेकिन जो समय जनसमस्याएं सुनने के लिए है उनमें जनता की बात सुनी जाएं और ऐसा ना लगे कि उसकी मजाक उड़ाई जा रही है क्योंकि पहले से ही अधिकारियों के कार्यालय अब किले बनते जा रहे हैं। बंद दरवाजों और सुरक्षाकर्मियों की भारी उपस्थिति कुछ कहने से पहले ही उसके उत्साह को ठंडा कर देती है तो ज्यादातर किले रूपी दफ्तरों का नजारा देखकर वापस चले जाते हैं और जो नहीं जाते हैं उनकी बात भी नहीं सुनी जा रही है। पीएमओ का नाम सेवा तीर्थ रखा गया और राजभवनों का नाम लोकभवन हो जाए यह तो बहुत ही अच्छा है क्योंकि इससे अपनेपन का अहसास होता है। लेकिन जनप्रतिनिधियों से आग्रह है कि अधिकारियों के कार्यालयों का गेट कम से कम तीन चार घंटे के लिए प्रतिदिन खुले रखवाए जाएं और आने वालों को यह अहसास कराया जाए कि उनकी समस्या का समाधान होगा। कुछ अधिकारी जो राजनेता बनते जा रहे हैं या अपने सहयोगियों के साथ बैठकर अपना महिमामंडन कराते हैं उन पर रोक लगे। तो पीएम सीएम साहब यह विश्वास से कहा जा सकता है कि नाम बदलने का प्रयास के सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। और जो नागरिकों की समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा वो होने लगेगा और कुछ निरंकुश अधिकारियों की कार्यप्रणली पर रोक लगेगी। इसलिए ऐसा माहौल भी देश प्रदेश में तैयार हो सके तो बहुत बढ़िया है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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