केन्द्र हो या प्रदेश की सरकार और बड़े जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों पर स्कूल आदि में होने वाले आयोजनों में कई बार यह कह चुके है कि हर स्कूल में महिलाओं के शौचालय अलग से हों ओर सेनेट्री नेपकिन उपलब्ध कराये जिससे वह बिना डरे स्कूल आयें और अपनी पढ़ाई पूरी करें इस संदर्भ में जागरूकता की भी कोई कमी नहीं है क्योंकि कई बड़े फिल्म स्टार फिल्में बना चुके हैं दूसरी तरफ कई सामाजिक संगठन और महिलाओं के द्वारा भी जागरूकता रैली निकालने के अतिरिक्त इन दो बातों के समाधान के लिए प्रयास किये जा रहे हैं बीती ३० जनवरी को माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये आदेश की न्याय और शैक्षिक समानताएं सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों और स्कूलों में सेनेट्री नेपकिन उपलब्ध कराने और अलग से शौचालय बनाने को कहा गया था। कोर्ट ने यह भी कहा गया था कि यह सुनिश्चित करने के कई निर्देश जारी हो चुके हैं अब सरकारी हो या नीजि हर स्कूल में उक्त सुविधा प्राप्त हो। लेकिन यह कितने आश्चर्य और शर्म की बात है कि बीते सोमवार को यह बताया गया कि स्कूलों में सेनेट्री नेपकिन और शौचालय न होने से प्रभावित न हो इसके लिए सभी राज्यों को सुनिश्चित करने को कहा गया है सवाल यह उठता है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री ७० हजार की कुर्सी पर बैठती है और सभी सरकारें महिलाओं को हर संभव सुविधाएं उपलब्ध कराने के वायदे कर रही है हमारी बेटियां भी पीछे नहीं है वह आज हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ रहीं है ऐसे में सिर्फ राज्यों को निर्देश देने और कोशिशों से कुछ होने वाला नहीं है सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को आत्मसात कर लड़कियों के लिए यह सुविधा हर हाल में जुटाने की आवश्यकता से अब नजरें नहीं चुराई जा सकती मेरा तो स्पष्ट मानना है कि केन्द्र और प्रदेश की सरकारें इन कामों के लिए अलग से बजट निर्धारित करें और प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक महिलाओं को सेनेट्री पैड और शौचालयों की सुविधा उपलब्ध करायें दूसरी तरफ यह देखने को मिलता है कि बाजार में किसी कार्य से आयी और फिर शौचालय के लिए इधर उधर घूमकर जब नहीं मिलते हैं तो बिना काम निपटाये घर चली जाती है। ऐसे में कितनी समस्याएं होती है यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।
बताते चलें कि देश के यशस्वी प्रधानमंत्री स्पष्ट कर चुके हैं शौचालय की आवश्यता पड़ने पर पुरूष हों या महिलाएं सबसे निकट होटल हो या सरकारी कार्यालय अथवा सार्वजनिक दुकान हो या मकान वहां शौचालय की व्यवस्था प्राप्त कर सकते हैं लेकिन निचले स्तर पर इसमें कार्यवाहीं नहीं होने से कहीं ऐसे स्थानों पर ऐसे बोर्ड नहीं लगे हैं कि आप यहा शौचालय उपलब्ध है उपयोग कर सकते हैं ऐसे में मेरा मानना है कि हर स्कूल के साथ साथ छोटे सभी बाजारों में सार्वजनिक स्थानों पर छोटे-बड़े स्वच्छ शौचालय बनाये जाये जहां इस समस्या का निस्तारण हो सके। मुझे लगता है कि अगर सरकार को संबंधित विभाग प्रयास करें इस समस्या के समाधान में जनप्रतिनिधि व्यापारी और समाज के लोग भी मदद कर सकते हैं और मेरा तो मानना है कि ऐसा कोई बाजार या मोहलला नहीं है चाहे गांव हो या शहर लोगों ने सरकारी भूमि न घेर रखी हो अगर कोई मर्जी से शौचालयों की व्यवस्था नहीं कराता तो जबरदस्ती नियमानुसार सरकारी भूमि खाली कराकर उस पर साफ सुथरे सुलभ शौचलय बनाये जाये और वहां बिना शुल्क के व्यवस्था की जाये और इस पर आने वाले खर्च का भुगतान या तो क्षेत्र के संबंधित कार्यालय अथवा व्यापारिक संगठनों समाजसेवी संस्थाओं आदि से इसकी अदायगी सुनिश्चित करायी जा सकती है लेकिन जो भी जैसे भी हो स्कूलों मेें सेनेट्री नेपकिन और शौचालयों और बाजारों में इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करायी जाये स्मरण रहे कि सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व महिलाओं के लिए सभी जगह पिंक शौचालय बनाने की घोषणा की थी मगर अभी तक उनकी संख्या ना के बराबर ही कही जा सकती है आखिर इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है तथा कई जगह शौचालयों पर या तो ताले लगा दिये गये या वहां व्यापार शुरू कर दिये गये उन्हें खाली कराकर वहां मातृशक्ति सहित पुरूषों के लिए वहां शौचालयों बनाये गये उन्हें ढूंढकर उन्हें जेल भेजा जाये।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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