नई दिल्ली, 25 मार्च, (भा)। सुप्रीम कोर्ट ने गत दिवस कहा कि केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े लोग ही अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं। अगर कोई ईसाई या किसी और धर्म में धर्मांतरण करता है तो वह अनुसूचित जाति का दर्जा खो देगा। जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ईसाई धर्म अपनाने वाला दलित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले किसी भी संरक्षण और आरक्षण का दावा नहीं कर सकता है। यह वैधानिक रोक पूर्ण है और इसमें किसी अपवाद की गुंजाइश नहीं है।
यह फैसला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मई 2025 के फैसले के खिलाफ लगाई गई चिंथदा की याचिका पर सुनाया गया। धर्म परिवर्तन के बाद पादरी बने चिंथदा आनंद ने याचिका लगाई थी कि उन्हें अक्काला रामिरेड्डी समेत कुछ लोगों से जातिगत भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।
1985 के सूसाई बनाम भारत सरकार से जुड़े एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाने के बाद दोबारा हिंदू धर्म में लौटता है, तो उसे एससी दर्जा प्राप्त करने के लिए विश्वसनीय प्रमाण और समुदाय की मंजूरी की जरूरत होगी। केवल लाभ प्राप्त करने के मकसद से धर्म परिवर्तन करने को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के साथ धोखा करार दिया।
1950 के आदेश में स्पष्ट है कि हिंदू, सिख, बौद्ध धर्म में ही अनुसूचित जातियां मौजूद हैं। अन्य धर्म अपनाने पर जन्म के आधार पर मिलने वाला यह दर्जा प्रभावी नहीं रहता। कानून इस बात की इजाजत नहीं देता कि कोई व्यक्ति एक साथ ईसाई धर्म का पालन करे और एससी होने का संवैधानिक लाभ ले। दोनों हालात एकदम उलट हैं। जो व्यक्ति अनुसूचित जाति में नहीं आता, वह एससी-एसटी एक्ट का लाभ नहीं ले सकता। ऐसे मामलों में सामान्य धाराओं के तहत ही केस दर्ज करना होगा।
कोई मूल धर्म में लौटता है, तो उसे साबित करना होगा कि मूल समुदाय ने उसे स्वीकार कर लिया है और वह पुरानी रीतियों का पालन कर रहा है। सिर्फ घोषणा काफी नहीं। आंध्र सरकार का 1977 का पुराना आदेश राष्ट्रपति की तरफ से जारी संवैधानिक आदेश की सीमाओं को नहीं बदल सकता।
चिंथदा का आरोप था- उसे जातिसूचक गालियां दी गईं। यह मामला विशाखापट्टनम जिले के अनाकापल्ली का है, जहां मूल रूप से एससी (माला समुदाय) के चिंथदा ने ईसाई धर्म अपना लिया और पादरी बन गया। कुछ दिन बाद गुंटूर जिले के कोथापलेम में रहने वाले अक्कला रामी रेड्डी नाम के शख्स पर चिंथदा ने आरोप लगाया कि अक्कला ने उसे जातिसूचक गालियां दी हैं। चिंथदा ने एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करवाया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर इस पर सुनवाई से इनकार कर दिया था। इसके बाद चिंथदा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। केस की जांच के दौरान पता चला था कि ईसाई धर्म अपनाने के कारण चिंथदा का अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया था। चिंथदा एक चर्च में करीब 10 साल से पादरी के तौर पर काम कर रहा है।
मूल धर्म में लौटने की तीन शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि उसने फिर से हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म अपना लिया है, तो उसे तीन शर्तें पूरी करनी होंगी। पहला, इसका स्पष्ट सुबूत होना चाहिए कि वह व्यक्ति मूल रूप से 1950 के आदेश के तहत अधिसूचित किसी जाति से संबंधित था। दूसरा मूल धर्म में वापस लौटने का विश्वसनीय और अकाट्य सुबूत होना चाहिए। तीसरा मूल जाति व संबंधित समुदाय के सदस्यों द्वारा उसे स्वीकार किए जाने का विश्वसनीय सुबूत होना चाहिए। पीठ ने कहा कि सिर्फ खुद से घोषणा करना काफी नहीं है।
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