प्रयागराज, 24 फरवरी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतर धार्मिक विवाह और लिव इन संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्तियों को पसंद के साथी के साथ रहने और विवाह करने का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जो समय के साथ समाज की बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं को ढालता है।
कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम, 2021 अंतरधार्मिक विवाह पर रोक नहीं लगाता। विवाह पंजीकरण अधिकारी केवल इस आधार पर विवाह पंजीकरण से इनकार नहीं कर सकते कि संबंधित पक्षों ने धर्मांतरण के लिए जिला प्राधिकारी से पूर्व अनुमति नहीं ली है। अदालत ने कहा कि ऐसी अनुमति अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक (डायरेक्टरी) है। इसे अनिवार्य माना जाए तो यह संविधान के अनुच्छेद 14-21 की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। अंतर धार्मिक विवाह करने या लिव इन रिलेशन में रहने वाले दर्जनों जोड़ों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर संरक्षण देने की मांग की थी। याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने यह निर्णय दिया।
अदालत ने वर्ष 2019 में जारी राज्य सरकार के उस शासनादेश का हवाला दिया, जिसमें अंतर्जातीय या अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को सुरक्षा, सुरक्षित आवास और आवश्यक संरक्षण देने के निर्देश दिए गए थे। अदालत ने कहा कि इस शासनादेश का कड़ाई से पालन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी चुनना व्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसमें राज्य या समाज हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

