जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता जस्टिस एनवी अंजारिया की शीर्ष पीठ द्वारा आम नागरिकों की कुत्तों से संबंध समस्याओं पर जो निर्णय दिया गया उसकी जितनी भी सराहना की जाए वो कम है। क्योंकि देश में अवारा कुत्तों के आतंक ने महिला पुरुष बच्चों को डरकर जीने के लिए मजबूर कर रखा था क्योंकि जब चाहे यह खतरनाक कुत्ते जिस पर चाहे हमला बोल देते थे और एनिमल समर्थक हंगामे के चलते जिम्मेदार खामोश हो जाते थे या पीड़ित पर ही कार्रवाई कर देते थे जिससे पीड़ित को न्याय नहीं मिल पाता था। पागल कुत्तों के आतंक पर फैसला देते हुए कहा गया कि गर्मी के सिद्धांत वाले युग में नहीं लौट सकते। लावारिस कुत्तों को सड़कों से हटाने वाले आदेश में कोई बदलाव ना करते हुए अदालत ने कहा कि पशु जन्म नियंत्रण सही तरह से लागू नहीं करने से यह समस्या काफी बढ़ गई है। अगर देशभर में कुत्तों के काटने पर आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो यह समस्या भय का कारण बनती जा रही है। एक खबर के अनुसार महाराष्ट्र में ५६,५३८, बिहार में ३४,४४२, उत्तर प्रदेश २०,४७८, दिल्ली में ३१९६ झारखंड में ५३४४ और उत्तराखंड में १७९० कुत्तों के हमलों के मामले सामने आते हैँ और जहां तक मुझे लगता है कि असली संख्या इससे बहुत ज्यादा हो सकती है क्येांकि वर्तमान में आदमी इस समस्या में उलझने की बजाय कुत्ता काटने के इंजेक्शन लगवाकर मामला रफा दफा कर लेते हैं जिससे ख्रूंखार कुत्तों के काटने की घटनाएं बढती जा रही थी। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय सही है कि बुजुर्गों व बच्चो के जीवन को भाग्य के भरोसे नहीं छोडृ सकते इसलिए खतरनाक कुत्तों को सजा ए मौत दे सकते हैं जिससे लोगों को बिना डरे जीने का अधिकार प्राप्त हो। अब रैबीज संक्रमित व आवारा खतरनाक कुत्तों को बिना किसी डर के स्वतंत्र घूमने का अधिकार इनके खिलाफ कार्रवाई कर पा सकते हैं। बताते चलें कि डॉग लवर्स की सभी याचिकाएं खारिज करते हुए इन खतरनाक पागल कुत्तों को इंजेक्शन देकर मारा जा सकता है क्योंकि उच्च न्यायालय का मानना है कि सम्मान के साथ जीने के अधिकार में कुत्तों के हमलों से मुक्त होकर जीना भी शामिल है। जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकते। आवारा पशुओं को हटाने के पूर्व के निर्देश भी जारी रहेंगे। अकेले यूपी के मेरठ को ही ले तो लगभग रोज खूंखार कुत्तों के शिकार १५० लोग अस्पतालों में पहुंच रहे हैं और कितने ही प्राइवेट डॉक्टरों से इंजेक्शन लगवाते हैं। मेरा भी मानना है कि अगर इनकी पकड़ने वालें सेंटर की क्षमता १०० और पकड़े केवल ३३ ही जा रहे हैं। इसलिए कुत्तों पर लगाम नहीं लग पा रही। पहली बार शायद यह हो रहा है कि आम नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर आवारा कुत्तों के मुददे पर अपने पुराने आदेश में कोई रियायत देने से इनकार कर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह स्थिति से आंखें नहीं फेर सकता। अदालत का यह रुख सम्मान योग्य है जिस पर सख्ती किया जाना सबसे बड़ा मुददा वर्तमान में था। शैक्षिक संस्थानाओं अस्पताल बस रेलवे स्टेशन व अन्य सार्वजनिक स्थानों से हटाने या नसबंदी किए जाने का अभियान जिम्मेदारों को चलाना चाहिए क्योंकि अगर इस ओर कार्रवाई नहीं हुई तो अदालत और निर्णय भी ले सकती है। तथा सरकार को खुद या कुत्तों के समर्थकों से पीड़ित को मुआवजा दिलाना होगा। दो दिन पहले मेरठ के पल्लवपुरम क्षेत्र में एक चालक की बेटी दुकान से सामान लेने गई जिसे कुत्ते ने तीन जगह काटा। कोई भी यह समझ सकता है कि जिस परिवार को १५ ह जार वेतन मिलता हो उसके बच्चों के साथ ऐसा हो जाए तो उस पर क्या गुजरती होगी और इलाज पर बचत खर्च की जाएगी। आखिर कब तक यह जुल्म झेलते। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की खबरें पढ़कर नागरिक खुश नजर आ रहे थे और उनका कहना था कि कोर्ट ने सही निर्णय लिया और अब सरकार और जिम्मेदारों को इसे लागू करने के लिए मजबूर किया जाए। एक बात समझ से परे हैं कि आखिर इन खतरनाक कुत्तों को मारने के लिए मौत का इंजेक्शन कौन देगा और डॉग लवर्स के हंगामें से पीड़ित को बचाने के लिए क्या होगा। मेरा मानना है कि फिलहाल इस अभियान में प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए और कुत्ते पकड़ने का लक्ष्य पूरा करें वरना सजा के पात्र बने और सरकार व पुलिस को यह समझ लेना चाहिए कि कुछ लोगों के दबाव में आकर पीड़ितों को और पीड़ित नहीं किया जा सकता। उनकी सुरक्षा जिम्मेदारी है। जो पूरी करनी होगी तथा सरकार भी आदेश जारी करे कि कुत्ता काटने पर उसके खिलाफ कार्रवाई होती है तो हंगामा करने वालों को किन धाराओं में सजा दी जा सकती है और दिया जाना अनिवार्य किया जाए। यह फैसला कोर्ट द्वारा दिया जा चुका है इसलिए पीड़ितों को मुआवजा देने का क्रियान्वयन शुरु हो तो अच्छा है और जानकार इस बारे मं पीड़ितों का मार्गदर्शन करें कि क्या कार्रवाई कर सकते हैं। फिलहाल मैं भी बहुत खुश हूं क्योंकि दो बार इन कुत्तों का मैं भी शिकार हो चुका हूं और एक बार १४ व दूसरी बार ४ इंजेक्शन लगवाने पड़े थे। लेकिन अब शायद यह समस्या ना रहे भगवान से यही प्रार्थना की जा सकती है कि वो कुत्तों से बचाव अभियान चलाकर नागरिकों को भयमुक्त जीने का अधिकार उपलब्ध कराए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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