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    Home»देश»माननीय न्यायालय और सरकार के निर्देशों का पालन हिंसक जानवरों के बारे में जनहित में जिम्मेदारों के खिलाफ हो कार्रवाई
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    माननीय न्यायालय और सरकार के निर्देशों का पालन हिंसक जानवरों के बारे में जनहित में जिम्मेदारों के खिलाफ हो कार्रवाई

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comJanuary 8, 2026No Comments7 Views
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    आवारा कुत्ते और बंदर आदि सहित अन्य हिंसक जानवर आम नागरिक के लिए बबाले जान बन गये है। कहीं मासूम बच्चों को नोंच रहे है तो कहीं इनके कारण दुर्घटनाग्रस्त होकर नागरिक घायल हो रहे है। स्थिति यह है कि कब सड़क पर चलने वाले व्यक्ति के पीछे यह पड़ जाए वो कहा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर यह कह सकते है कि हिंसक जानवरों का भय आम आदमी में इतना उत्पन्न हो गया है कि कई लोगों ने तो सुबह शाम की सैर करना भी बंद कर दिया है। मजे की बात यह है कि पशु प्रेम के नाम पर कुछ लोग इनसे नागरिकों को बचाने के लिए तो कुछ नहीं करते और जहां तक नजर आ रहा है वैसे भी इनके द्वारा मूक पशुओं की सुविधा के लिए कुछ किया जाता हो वो दिखाई नहीं देता। लेकिन जब भी पीड़ित नागरिकों के हित में कहीं कोई अभियान चलता है तो यह लोग झुड बनाकर पहुंच जाते है और उसका विरोध करते है। और जिम्मेदार अफसर सरकार और न्यायालय के निर्देशों को भी नजर अंदाज कर इन आवारा पशुओं के खिलाफ कोई कार्रवाई तो करते नहीं इन्हें संरक्षण देने वालों को भी कुछ नहीं कहा जाता। बीते दिनों मेरठ में एक पार्षद अभियान के तहत नगर निगम कर्मियों के साथ मौजूद था जिसके साथ कुछ तथाकथित पशु प्रेमियों ने मारपीट की। जबकि वार्ड 29 के पार्षद पवन चौधरी की कोई गलती नहीं थी। बताते है कि इस शहर में 90 हजार आवारा कुत्ते इसके अलावा हिंसक बंदर आदि मौजूद है। मगर कहीं सुविधा न होने और कहीं मजबूत इरादों में कमी इस मामले में पीड़ित नागरिकों को आसानी से राहत मिलती नहीं नजर आ रही है। हालत यह हो गई है कि देश के कुछ जिलों और कालोनियों में ऐसी सड़कों की पहचान हो गई है जहां कुत्तों का वर्चस्व कायम है और लोग वहां से गुजरना भी पसंद नहीं करते। स्थिति यह है कि जिलों में जिम्मेदार अफसर सरकार और न्यायालय के आदेशों के बावजूद इस संदर्भ में कोई कार्रवाई प्रभावी रूप से नहीं कर रहे है। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि कुत्तों के चलते आखिर कब तक परेशानी झेलेंगे आम लोग। लावारिश पशुओं से मुक्त कराई जाए सड़कें इनके कारण हादसों का भी शिकार हो रहे है नागरिक। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि स्कूलों व कोर्ट परिसर में कुत्तों की क्या आवश्यकता है। पशु अधिकार समूह की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की दलील पर कि कुत्तों की काउंसिलिंग ही बाकी रह गई है।
    अपने देश में पशु विरोधी कोई नहीं है बेजुवान जानवरों की सुविधाओं के लिए भी नागरिक करते है प्रयास। उन्हें खाना भी खिलाया जाता है और प्यार भी दिया जाता है। इसलिए किसी को भी पशु विरोधी कहना सही नहीं है। लेकिन जहां हिंसक जानवर नागरिकों को निशाना बनाने में लगे हो वहां जरूरी हो जाता है कि अब वहां ठोस कार्रवाई होनी ही चाहिए। माननीय न्यायालय का यह कथन बिलकुल सही है कि जिन राज्यों में आवारा जानवरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी वहां राज्य सरकारों पर की जाएगी कार्रवाई। मेरा मानना है कि सरकार हिंसक जानवरों से सड़के मौहल्लों को मुक्त कराये और न्यायालय के द्वारा दिये गये निर्देशों तथा सरकार के द्वारा बनाये गये नियमों का पालन हो। और ना करने वाले विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों को संविधान के तहत जो कुछ हो सकता है उसके तहत कार्रवाई की जाए। तथा हर सरकारी अस्पताल डिस्पेंसरी आदि में कुत्ता काटे के इंजेक्शन उपलब्ध रहे और चौबीस घंटे पीड़ितों की देखभाल के लिए खुद डाक्टर की मौजूदगी तथा पशु प्रेमियों को भी इस संदर्भ में उनसे भी सलाह की जाए कि इस समस्या का समाधान कैसे हो। अगर वो इस संदर्भ में कोई संतोषजनक उत्तर न दे तो फिर जनता की भावनाओं और सरकार के नियमों के अनुकूल आम आदमी को इस हिंसक खौफ से बचाने के लिए जो भी हो सकता हो वो अनिवार्य रूप से किया जाए। क्योंकि अब इनके द्वारा किया जा रहा उत्पीड़न हर परिवार के लिए असहनीय होता जा रहा है पीड़ित की तो बात ही कुछ और है।
    (प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए व पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार)

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