Close Menu
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Trending
    • मेरठ के पुराना 5 सिविल लाइंस में रिहायशी हाउस नं 268 की भूमि पर कथित कमर्शियल साम्राज्य !
    • ‘बांके बिहारी मंदिर चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनाया सख्त रुख
    • रालोद की पूर्व जिलाध्यक्ष सर्वेश पुंडीर कांग्रेस में शामिल
    • मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्ष में हुई कैबिनेट की बैठक
    • प्रशासनिक अधिकारियों ने किया शहर के प्रमुख बाजारों और मार्गों पर पैदल मार्च
    • मानक पूरे किये बिना रेस्टोरेंट खोलने पर प्रदर्शन की चेतावनी
    • मेरठ बार एसोसिएशन के सभागार में पूर्व अध्यक्ष और महामंत्रियों की महत्वपूर्ण बैठक हुई
    • 37 साल की देश सेवा के बाद भी भारतीय नागरिक होने का देना पड़ रहा प्रमाण
    Facebook Instagram X (Twitter) YouTube
    tazzakhabar.comtazzakhabar.com
    Demo
    • न्यूज़
    • लेटेस्ट
    • देश
    • मौसम
    • स्पोर्ट्स
    • सेहत
    • टेक्नोलॉजी
    • एंटरटेनमेंट
    • ऑटो
    • चुनाव
    tazzakhabar.comtazzakhabar.com
    Home»देश»ऐतिहासिक महत्त्व ईद उल जुहा का
    देश

    ऐतिहासिक महत्त्व ईद उल जुहा का

    websitemarketing2019@gmail.comBy websitemarketing2019@gmail.comMay 23, 2026No Comments1 Views
    Facebook Twitter Pinterest LinkedIn WhatsApp Reddit Tumblr Email
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn Pinterest Email

    नई दिल्ली, 23 मई (ता)। ईद उल फितर की तरह ही इस दिन भी मुसलमान ईदगाह जाकर ईद की नमाज अदा करते हैं और सब लोगों से गले मिलते हैं। इसके बाद किसी हलाल जानवर ऊंट, भेड़, बकरा आदि की कुर्बानी देते हैं। इसी अवसर पर पवित्र शहर मक्का में हजरत इब्राहीम, हजरत इस्माईल और हजरत इब्राहीम की पत्नी व हजरत इस्माईल की मां हजरत हाजरा की सुन्नतों को अदा करते हैं। हज का मुख्य कार्यक्रम जिलहिज्ज की 8 तारीख से शुरू होकर पांच दिन अर्थात 12 जिलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 जिलहिज्ज को कुर्बानी भी शामिल है..
    ईद उल जुहा अथवा ईद-उल-अजहा इस्लामी कैलेण्डर (हिजरी) के आखिरी महीने अर्थात जिलहिज्ज की 10 तारीख को मनाई जाती है। ईद उल जुहा को बकरीद भी कहा जाता है। ईद उल फितर की तरह ही इस दिन भी मुसलमान ईदगाह जाकर ईद की नमाज अदा करते हैं और सब लोगों से गले मिलते हैं। इसके बाद किसी हलाल जानवर ऊंट, भेड़, बकरा आदि की कुर्बानी देते हैं। इसी अवसर पर पवित्र शहर मक्का में हजरत इब्राहीम, हजरत इस्माईल और हजरत इब्राहीम की पत्नी व हजरत इस्माईल की मां हजरत हाजरा की सुन्नतों को अदा करते हैं। हज का मुख्य कार्यक्रम जिलहिज्ज की 8 तारीख से शुरू होकर पांच दिन अर्थात 12 जिलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 जिलहिज्ज को कुर्बानी भी शामिल है। आदिकाल से ही जब ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की तो इनसान को सही जीवन जीने के लिए अपने पसंदीदा बंदों या नबियों के द्वारा ऐसा संविधान और जीवन दर्शन भी भेजा, जो मानव समाज को कुर्बानी अर्थात बलिदान का महत्त्व समझा सके और उसमें यह भावना भी पैदा कर सके। इस संविधान के आदम से लेकर तमाम नबी अपने साथ लाए। इस संविधान या जीवन दर्शन में अन्य बातों के अलावा इनसान को अपने अहंकार व अपनी प्रिय वस्तुओं को अल्लाह की राह में और उसकी इच्छा के लिए कुर्बान करने की भी शिक्षा दी गई।
    ईद अल अजहा या ईद-ए-कुर्बां एक बड़ी कुर्बानी की यादगार के रूप में मनाई जाती है। हजरत इब्राहीम एक पैगंबर थे। उन्हें अल्लाह का आदेश हुआ कि अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को हमारी राह में कुर्बान कर दो। इब्राहीम ने अपने बेटे इस्माईल को इस बारे में बताया तो उन्होंने भी खुदा की बंदगी के सामने सर झुकाते हुए पिता इब्राहीम को इस पर सहमति दे दी। हजरत इब्राहीम इस्माईल को मीना के मैदान में ले गए। बेटे को जमीन पर लिटाया, अपनी आंखों पर पट्टी बांधी, ताकि प्रिय बेटे के कुर्बान होने का मंजर न देख सके और बेटे की गर्दन पर छुरी फेर दी। इस बात का उल्लेख कुरआन ने इन शब्दों में किया है कि इब्राहीम ने इस्माईल के होशियार होने के बाद उन्हें राहे खुदा में कुर्बान करने के लिए उनके गले पर छुरी फेर दी। लेकिन अल्लाह को इब्राहीम के बंदगी की यह अदा इतनी पसंद आई कि इस्माईल को उस जगह से हटाकर स्वर्ग से एक दुम्बा (भेड़) को उसके स्थान पर भेज दिया गया और इस्माईल को बचा लिया गया। केवल यही नहीं इब्राहीम की इस कुर्बानी को महत्त्व दिया गया कि हर साल इस दिन किसी जानवर की कुर्बानी को तमाम लोगों पर फर्ज ठहरा कर इसे एक इबादत का दर्जा दे दिया गया। यही नहीं बल्कि जिस जगह अर्थात मीना के मैदान में यह कुर्बानी दी गई, उस मैदान को भी इस तरह यादगार बना दिया गया कि हर वर्ष हज के अवसर पर हाजी वहां पर उपस्थित होकर कुर्बानी व हजरत इब्राहीम के द्वारा कुर्बानी के दौरान अपनाए गए कुछ अमल (मानसिक) को अदा करते हैं।
    कुर्बानी का महत्त्व यह है कि इनसान ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव व प्रेम का इजहार करे और उसके प्रेम को दुनिया की वस्तु या इनसान से ऊपर रखे। इसके लिए वह अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु को कुर्बान करने की भावना रखे। कुर्बानी के समय मन में यह भावना होनी चाहिए कि हम पूरी विनम्रता और आज्ञाकारिता से इस बात को स्वीकार करते हैं कि अल्लाह के लिए ही सब कुछ है। वही आसमान और जमीन को पैदा करने वाला, वही सबसे बड़ा हाकिम और पालनहार है, उसी के कब्जे में सब कुछ है, हम उसी के आदेशों व आज्ञा का पालन करते हैं और हमारा मरना व जीना सब कुछ अल्लाह के लिए ही है।
    कुर्बानी का उद्देश्य
    कुर्बानी का एक उद्देश्य गरीबों को भी अपनी खशियों में भागीदार बनाना है। इसीलिए कहा गया है कि कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटों। एक हिस्सा अपने लिए, दूसरा अपने पड़ोसियों के लिए और तीसरा गरीबों व यतीमों के लिए रखो।

    Desh New Delhi Religion tazza khabar tazza khabar in hindi The Historical Significance of Eid-ul-Adha
    Share. Facebook Twitter Pinterest LinkedIn Tumblr Telegram Email
    websitemarketing2019@gmail.com
    • Website

    Related Posts

    मेरठ के पुराना 5 सिविल लाइंस में रिहायशी हाउस नं 268 की भूमि पर कथित कमर्शियल साम्राज्य !

    August 26, 2026

    ‘बांके बिहारी मंदिर चढ़ावे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनाया सख्त रुख

    August 26, 2026

    रालोद की पूर्व जिलाध्यक्ष सर्वेश पुंडीर कांग्रेस में शामिल

    August 26, 2026
    Leave A Reply Cancel Reply

    © 2026 Tazza khabar. All Rights Reserved.
    • Our Staff
    • Advertise

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.