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    Home»देश»तलाक के ऐसे प्रकरण गुजारा भत्ते और दहेज के मामले में हो सकते हैं अहम, सरकार और समाजसेवी संगठन जनहित में इसका कराए प्रचार प्रसार
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    तलाक के ऐसे प्रकरण गुजारा भत्ते और दहेज के मामले में हो सकते हैं अहम, सरकार और समाजसेवी संगठन जनहित में इसका कराए प्रचार प्रसार

    adminBy adminDecember 12, 2025No Comments20 Views
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    वर्तमान समय में जब छोटी छोटी बातों पर वैवाहिक संबंध खत्म होने की कगार पर पहुंच जाते हैं और दहेज मांगने के नाम पर वर पक्ष के लोगों की उत्पीड़न की खबरें सुनने को मिलती है और तलाक के साथ भरण पोषण भत्ता मांगने में सारी सीमाएं लांघ दी जाती है और अब तो पुरूष भी गुजारा भत्ते की मांग करने लगे हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में तलाक का एक ऐसा मामला सामने आया जो अपने आप में उल्लेखनीय कहा जा सकता है। इस बारे में एक खबर के अनुसार पति और पत्नी के बीच तनावपूर्ण विवाह को समाप्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महिला की इस बात को लेकर सराहना की कि उसने विवाह के समय पति की मां द्वारा दिए गए सोने के कंगन वापस कर दिए। अदालत ने कहा कि यह एक रेयर समझौता है जिसमें पत्नी द्वारा पैसे का दावा नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि हम इसकी सराहना करते हैं और महिला से कहा कि आप बीती बातें भूलकर खुशहाल जीवन बिताएं। सुनवाई की शुरुआत में महिला के वकील ने कहा कि उन्होंने न तो कोई भरण-पोषण मांगा है और न ही कोई अन्य आर्थिक मुआवजा।
    जब अदालत को बताया गया कि केवल कंगन वापस करने का मुद्दा ही बाकी है, तो पीठ ने पहले यह समझा कि पत्नी ने अपना स्त्रीधन लौटाने की मांग की है। लेकिन तुरंत ही महिला के वकील ने मामले को पूरी तरह स्पष्ट किया कि वास्तव में महिला स्वयं वे गहने लौटा रही है, जो उसे विवाह के समय पति की मां की ओर से मिले थे।
    कोर्ट ने इसे बताया तलाक का दुर्लभ समझौता
    जस्टिस पारदीवाला ने टिप्पणी की कि यह बहुत दुर्लभ समझौता है, जो अदालत ने देखा है, और उन्होंने विवाह विच्छेद का आदेश पारित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। कोर्ट ने कहा कि यह उन दुर्लभ समझौतों में से एक है, जहां किसी भी प्रकार की मांग नहीं की गई है। इसके विपरीत, पत्नी ने वे सोने के कंगन लौटा दिए हैं, जो उन्हें विवाह के समय मिले थे। कोर्ट ने कहा, हमें बताया गया है कि ये कंगन पति की मां के थे। हम इस उदार कदम की सराहना करते हैं, जो आजकल बहुत कम देखने को मिलता है।
    कोर्ट ने स्पेशल पावर का इस्तेमाल कर भंग की शादी
    जस्टिस पारदीवाला ने महिला से कहा कि यह उन विरले मामलों में से एक है, जहां किसी चीज का लेन-देन नहीं हुआ। बीती बातें भूलकर खुशहाल जीवन बिताएं। इसके बाद अदालत ने अंतिम आदेश पारित किया, हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए दोनों पक्षों के बीच विवाह को भंग करते हैं। पक्षकारों के बीच किसी भी अन्य लंबित कार्यवाही, यदि कोई हो, उसे भी समाप्त किया जाता है।
    सुप्रीम कोर्ट बोला- हम आपकी सराहना करते हैं, खुश रहो
    लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक यह केस जस्टिस जे बी पारदीवाला और के वी विश्वनाथन की बेंच के सामने आया। जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि यह एक बहुत कम होने वाला समझौता है, जो कोर्ट के सामने आया है, क्योंकि पत्नी ने अपने पति से कुछ भी नहीं मांगा और तलाक का आदेश जारी कर दिया। जस्टिस पारदीवाला ने महिला से कहा कि यह उन दुर्लभ मामलों में से है जहां किसी प्रकार का लेन-देन नहीं हुआ। हम आपकी सराहना करते हैं। अतीत को भूलकर खुशहाल जीवन बिताइए। बेंच ने आपसी सहमति से शादी खत्म करने का फैसला किया।
    जब मुस्कुरा उठे जस्टिस पारदीवाला
    सुनवाई की शुरुआत में महिला की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को सूचित किया कि उनकी मुवक्किल किसी भी प्रकार के गुजारे भत्ते या एलिमनी की मांग नहीं कर रही हैं। उसे केवल सोने के कंगन लौटाने हैं। इस पर बेंच ने पहले गलतफहमी में यह समझा कि पत्नी अपनी स्त्रीधन वापस मांग रही है लेकिन जैसे ही वकील ने यह स्पष्ट किया कि ये कंगन महिला खुद लौटा रही है, जो शादी के समय सास ने उसे तोहफे में दिए थे। यह सुन जस्टिस पारदीवाला मुस्कुरा उठे। उन्होंने कहा, यह बहुत दुर्लभ समझौता है जो हमने देखा है। ऐसे उदाहरण आजकल कम ही देखने को मिलते हैं।
    पिछले लगभग पांच दशक से मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हूं और यह नहीं कह सकता कि इससे पहले बिना किसी लेनदेन के तलाक ना हुए हो। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि किसी भी प्रकार का भत्ता ना मांगे जाने और अपनी सास को सोने के कंगन वापस करने जैसी सैद्धांतिक बातें ऐसे मामलों में कम ही सुनने को मिलती हैं। मुझे लगता है कि दहेज के मुकदमों व आरोपों में कमी लाने के लिए समाजसेवी संगठनों और सरकार को जनहित में इस मामले का प्रचार प्रसार कराना चाहिए क्योंकि गुजारा भत्ता दहेज तलाक यह ऐेसे शब्द है जिन्हें सुनकर पीड़ित के साथ ही आम आदमी भी पढ़कर परेशान हो जाता है। मगर यह प्रकरण अनुकरणीय है।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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