खाद्य पदार्थों में मिलावट की बात अब कोई नई नहीं है। मीडिया में कई बार पढ़ने सुनने देखने को नामी कंपनियों के नकली उत्पाद बिकने या पैकेट बंद उत्पादों या डीलर के यहां एक्सपायरी डेट मिलावट या उनमें सेहत के लिए हानिकारक चीजें मिलने की बात सामने आती है। कई नामी ब्रांडस तो इस बारे में गुमराह करने वाले फूडस लेवल के खिलाफ नोटिस जारी किए गए हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण एफएसएसएआई ने कहा कि कंपनियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के तहत ब्रांडिग उत्पादों से जुड़े उत्पादों पर लेवलिंग के नियमों के उल्लंघन पर एफबीओ को नोटिस जारी किया गया है। जिसमें फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड २००६ एक्ट के उल्लंघन की बात कही गई है। नोटिस पाने वाली कंपनियों में इमामी हेल्दी एंड टेस्टी, हेल्थ एड, ट्रूवी, द हेल्दी फैक्टरी, हेल्दी मास्टर, हेल्दी चॉइस, प्लान बी और न्यूहर्ब्स शामिल बताई गई है। नियामक ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंच के माध्यम से इस कार्रवाई की जानकारी दी। एफएसएसएआई के अनुसार, इमामी हेल्दी एंड टेस्टी का श्ट्रेड्य नाम उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता है और यह लागू नियमों का उल्लंघन प्रतीत होता है। यह कंपनी कोलकाता स्थित इमामी समूह की खाद्य तेल इकाई है।
वहीं, प्लान बी अपने उत्पादों को श्प्लांट बेस्ड वीगन्य के रूप में प्रचारित करती है। द हेल्दी फैक्टरी के श्जीरो मैदा होल व्हीट ब्रेड्य और श्जीरो मैदा पिज्जा बेस्य उत्पादों को भी जांच के दायरे में लाया गया है। न्यूहर्ब्स की श्ट्रू विटामिन्य उत्पाद श्रृंखला को भी नोटिस मिला है। एफएसएसएआई के अनुसार, श्ट्रू विटामिन्य जैसा व्यापारिक नाम उसके नियमों में परिभाषित या मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए यह उपभोक्ताओं को गुमराह कर सकता है।
इसी प्रकार, ट्रूवी के हेल्दी मिक्स वेजी चिप्स, हेल्दी रागी चिप्स और हेल्दी मूंग दाल चिप्स जैसे स्नैक उत्पादों पर श्हेल्दी्य होने के दावे को लेकर सवाल उठाए गए हैं। नियामक का कहना है कि इनमें कई अन्य सामग्री भी शामिल हैं, ऐसे में इन उत्पादों को श्हेल्दी्य बताना भ्रामक हो सकता है। एफएसएसएआई ने हेल्दी मास्टर की श्टैगलाइन्य श्श्विजन टू सर्व हेल्दी्य्य, हेल्दी चॉइस के श्श्हेल्दी फूड फॉर हेल्दी लाइफ पोहा्य्य और हेल्थ एड के ब्रांड नाम पर भी आपत्ति जताई है। प्राधिकरण का मानना है कि ये नाम और दावे उत्पादों की प्रकृति को लेकर उपभोक्ताओं को भ्रमित कर सकते हैं।
अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर प्रमुख कंपनी नेस्ले इंडिया के नूडल्स में कीड़े मिलने का समाचार चला जिसे कंपनी ने भ्रामक बताते हुए आरोपों को ठुकराया। इसके अलावा कई बार जानकारी मिलती है उसके अनुसार हम अपने घर होटल व रेस्टोरेंट में जिस टोमेटो सोस व अन्य चीज का उपयोग करते हैँ उनको लेकर भी सवाल उठते हैं। टोमेटो सोस में तो कददू मिलाने की खबरें आम होती हैं। कुछ दिन पहले लखनऊ की एक नामी कंपनी के सेल्स शोरुम पर एक्सपायरी डेट के रसगुल्ले मिले थे। तो एक डॉक्टर को यह कहते सुना था कि रसगुल्लों में कीड़े चल रहे थे। कहने का मतलब यह है कि मिलावटी खाद्य सामग्री खाने से नागरिक किसी ना किसी बीमारी का शिकार हो रहे हैं। जब उपभोक्ता इनसे दो चार होता है और इन मुददों को उठाता है तो कंपनियों और व्यापारियो के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती और वो उपभोक्ता की बात को झूठा सिद्ध करते हैं और विभाग सब जानते हैँ कि ऐसे मामले कितने गंभीर होते हैं। कुछ दिन पहले नोएडा में एक व्यक्ति ने समोसे लिए तो उसमें फफूंदी लगी थी। होटल से शाकाहारी भोजन मंगाया और उसमें निकला मांसाहारी, ऐसे मुददे आए दिन सामने आते हैं। वीआईपी द्वारा विभिन्न कंपनियों के भ्रामक विज्ञापन किए जाते रहे हैं। प्रतिबंध के बावजूद अनेकों प्रकार के गुटकों, कपड़ों और रियल एस्टेट का विज्ञापन यह करते हैं। कई को नोटिस दिए गए लेकिन बाद की कार्रवाई का पता नहीं चलता। मेरा मानना है कि विभिन्न प्रकार के शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों सोस मैगी जैसे उत्पादों की नियमित रुप से इनके बनने के स्थान पर सफाई व मिलावट की जांच की जाए और अगर उपभोक्ता किसी माध्यम से साक्ष्य प्रस्तुत करता है तो कंपनी के यह कहने से कि हमारे यहां ऐसा नहीं था मामले को रफा दफा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उद्योगपति कई तरीकों से उपभोक्ताओं को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कुछ दिन पहले एक आदेश हुआ कि टैक्स कम होने से कंपनियां अपने उत्पादों के दाम घटाए तो कई ने यह कहकर कि हम वजन बढ़ा रहे हैं आई गई स्थिति हो गई। ना जिम्मेदारों को ध्यान रहा ना उपभोक्ता के पास इतना समय है कि वो पांच दस ग्राम के लिए लड़ाई लड़े। एक खबर पढ़ी कि झांसी में एक दुकान पर सामान खरीदा तो ग्राहक ने जांच कराई तो दुकानदार पर दस ग्राम सामान कम मिलने पर एक लाख से ज्यादा का जुर्माना लगाया गया। एक फिल्म में बैंकों में ग्राहकों से छोटी रकम विभिन्न नामों पर ली जाती थी या ब्याज में हेरफेर किया जाता था। एक ग्राहक अदालत गया तो कुछ पैसों का मामला करोड़ों में बैकंों के लिए लाभ का सौदा था। अगर आप सामान खरीदने गए हैं तो खुले पैसे ना होने पर दुकानदार कोई और सामान नहीं दे सकता। इसके खिलाफ अभियान भी चला जो फुस्स हो गया। कहने का मतलब है कि हम उपभोक्ता हित में नियमित अभियान क्यों नहीं चलवा पाते और दोषी उत्पादों व विज्ञापन करने वालों पर क्या कार्रवाई हुई इसका खुलासा क्यों नहीं करते। उपभोक्ता एक है उसे विभिन्न नामों पर आर्थिक चूना लगानेवाले बहुत हैं जिसे रोकने के लिए सरकार काफी प्रयास कर रही है और हर जिले में अफसर तैनात है। उसके बावजूद उपभोक्ता को नुकसान पहुुंचाने वालों की संख्या नागरिकों के अनुसार बढ़ती ही जा रही है। दवाईयों पर दस से बीस प्रतिशत की छूट दी जाती और कुछ दुकानदार एक रुपया भी नहीं छोड़ते क्योंकि वह दवाई सिर्फ उसके पास ही मिलती है। उपभोक्ता को अब धोखों से बचाने के लिए अफसरों को नियमित कार्रवाई करने के लिए मजबूर किया जाए और अगर कोई इसमें आनाकानी करता है तो उसे सेवानिवृत कर पेंशन समाप्त की जाए। साथ ही कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि लाभ केवल उसे मिल रहा है और नुकसान जनता का हो रहा है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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