सोशल मीडिया मंच सबसे चर्चित बनता जा रहा है। कुछ बुजुर्ग युवा लेखकों ने इसे बदनाम करने और इसकी कमियां गिनाने का ठेका सा ले रखा है जबकि यह खुद और इनके परिजन इसका खूब उपयोग कर उससे लाभ भी उठा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है इस पर विचार करे तो इस क्षेत्र में कुछ लोगों का एकछत्र राज था सोशल मीडिया के सक्रिय होने से वो समाप्त हो गया क्योंकि अब हर विषय के लेख समाचार और जानकारी जिन्हे जुटाने में एढी से चोटी का जोर लगाना पड़ता था और लेखकों की अलग ही ठसक थी वो खत्म हुई और वर्चस्व कमजोर हो गया है। इसके चलते यह कह सकते हैं कि अपनी पूछ कम होने के चलते चमक धमक दूर होने से हीनभावना कुछ लोगों में हुई और उन पर विश्वास करने वाले मिलकर सोशल मीडिया के खिलाफ एक अभियान चलाए हुए हैं। कोई इससे बच्चों का भविष्य खराब होने की बात कर रहा है और कोई मानसिक संतुलन खराब होने की बात कर रहा है। हर कोई किसी तरह सोशल मीडिया को बदनाम करने का अभियान चला रहा है।
मेरा मानना है कि सोशल मीडिया से बच्चों को बचाने की नहीं जागरुक करने की आवश्यकता है क्योकि गलत सामग्री का अवलोकन करने की बजाय ज्ञान को बढ़ाने जीवन में आने वाले विषयों का अवलोकन करे तो अकेला यही मीडिया ऐसा है जिस पर कम खर्च में बड़े लाभ उठाए जा सकते हैं जो किसी और क्षेत्र से नहीं। मैं सोशल मीडिया की आलोचना वालों से कहता हूं कि वो इस मंच पर एक घंटा इसका मनन करे तो व्यापार ज्ञान और जानकारी बढ़ाने के साथ साथ बच्चों के विकास में सहयोग करने वाली सामग्री सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं। जब से सोशल मीडिया प्रचलन में आए तब से एक लाख के खर्च में कटौती हुई जो अपने आप में उपलब्धि कह सकते हैं और जिस प्रकार से खोए परिजनों को यह मंच मिला रहा है पांच दशक बाद और इससे संबंध एआई और अन्य व्यवस्थाएं जुड़ी है वो कितनी उपयोगी हैं उसका पता उनका अवलोकन करने से ही हो सकता है। कहने का आश्य है कि अब सोशल मीडिया को काफी वर्ष हो चुके हैं और कौव्वों के कोसने से ढोर नहीं मरते वाली कहावत को इसकी आलोचना करने वाले समझे लें कि इसका उपयोग प्रधानमंत्री से लेकर गांवों के परिवारों में हो रहा है। जांच कराई जाए तो जो लोग सोशल मीडिया को कोस रहे हैं उनके घरों में इसका उपयोग होता खूब मिलेगा। एक वरिष्ष्ठ पत्रकार एक सम्मेलन में सोशल मीडिया की बुराई कर रहे थे और कुछ देर बाद संवाददाता को अपनी सोशल साइट दिखाकर अपनी उपलब्धियों को दिखा रहे थे। जब मेंने इसके बारे में पूछा तो वह झेंप गए। ज्यादातर की स्थिति यही है। पानी का गिलास आधा खाली है यह ना सोचकर जो है उसे पीया जाए तो आधा खाली होने की आलोचना सही नहीं कही जा सकती।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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