नई दिल्ली, 07 मार्च (दि)। रंग पंचमी को देव पंचमी और श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू धर्म में इस दिन का खास महत्व होता है, क्योंकि कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को भगवान कृष्ण और राधा रानी ने होली खेली थी। इस दिन पर देवी-देवताओं को रंग-गुलाल अर्पित किया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रंग पंचमी का दिन देवी-देवताओं को समर्पित होता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन रंगों का प्रयोग करने से दुनिया में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। माना जाता है कि इस दिन जो रंग एक-दूसरे को लगाते हैं वह आसमान की ओर उड़ाते हैं। ऐसा करने से देवी-देवता आकर्षित होकर अपनी कृपा बरसाते हैं। चौत्र कृष्ण पक्ष की पंचमी को रंग पंचमी होती है। पंचांग के अनुसार रंग पंचमी का पर्व होली के लगभग पांच दिन बाद मनाया जाता है। यह पर्व भारत के कई हिस्सों जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान, मथुरा-वृंदावन आदि में लोकप्रिय है।
ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी-देवता पृथ्वीलोक पर आकर रंग खेलते हैं। कालिदास द्वारा रचित कुमारसंभवम् में निहित है कि देवी मां सती के आहुति के बाद भगवान शिव ने दूसरी शादी न करने का प्रण लिया था। यह जान तारकासुर ने ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या कर यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसका वध भगवान शिव के पुत्र के अलावा कोई और न कर सके। यह जान देवता चिंतित हो उठे। तब देवताओं ने ब्रह्मा जी और विष्णु जी की मदद से कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने की सलाह दी। कामदेव के दुस्साहस को देख भगवान शिव ने तत्क्षण ही उसे भस्म कर दिया। इस पर कामदेव की पत्नी देवी रति व अन्य देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने कामदेव को पुनरू जीवित करने का आश्वासन दिया। इस घटना से प्रसन्न होकर सभी देवी-देवता रंगोत्सव मनाने लगे। तभी से रंग पंचमी मनाने की शुरुआत हुई।
भारत में धार्मिक व्रतों का सर्वव्यापी प्रचार रहा है। यह हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लिखित हिंदू धर्म का एक व्रत संस्कार है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, रंग पंचमी का दिन भगवान कृष्ण और राधा रानी जी को अर्पित माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर द्वापर युग में श्री कृष्ण और राधा जी ने एक-दूसरे के साथ रंगोत्सव मनाया था। इसी कारण इस दिन को कृष्ण पंचमी तथा देव पंचमी भी कहा जाता है। मथुरा वृंदावन में, यह दिन होली के उत्सव का अंतिम दिन होता है।
रंग पंचमी पर राधा-कृष्ण जी की साथ में पूजा करने का विशेष महत्व माना गया है। इससे साधक को प्रेम संबंधों में मजबूती आती है। साथ ही इस दिन पर अपने-अपने आराध्य देव को भी रंग अर्पित किया जाता है। इस दिन पर हवा में गुलाल उड़ाया जाता है और यह माना जाता है कि जिस भी व्यक्ति पर यह रंग आकार गिरता है, उसे देवी-देवताओं की विशेष कृपा मिलती है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और गुजरात में बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन रंगों की बौछार, गुलाल उड़ाने और विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है।
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