25 मई से 2 जून तक चल रहे नौतपा का हौव्वा भले ही मीडिया द्वारा दिखाया जा रहा हो लेकिन दो दिन बीतने के बाद कुछ ऐसा नहीं दिखा कि कोई बहुत बड़ा पहाड़ गर्मी का टूट पड़ा। मैं यह नहीं कहता कि नौतपा की सूचना ना दी जाए लेकिन इसका जितनाप्रसार किया गया वो सही नहीं था आज खबर पढ़ी कि २७ से राहत मिलेगी तो अगर २७ से राहत मिलेगी तो इसका असर कहा है। आम आदमी में इसका डर पैदा करने की कोशिश की गई उसके पीछे क्या राज था। एक फायदा जरुर हुआ कि समाजसेवी संगठनों व्यापारियों धार्मिक संगठनों ने जगह जगह शरबत का वितरण कर नागरिकों को ठंडक पहुचाने की कोशिश की। कई बार ऐसा देखने को मिला है कि मौसम को लेकर घोषणाएं होती है लेकिन वैसा होता कुछ नहीं। देश के किसी कोने में वो बात सच होती है लेकिन डर जो खबरों से होता है वो सब जगह हावी हो जाता है। इससे कई लोगों के जरुरी काम रुक जाते हैं और कुछ को बहाना मिल जाता है। इससे देश के विकास कार्यों में बाधा भी होती है। पिछले दिनों पुलिस कर्मचारियों ने भी शरबत का वितरण किया। मेरा मानना है कि मौसम की सूचना महत्वपूर्ण हो गई है। नागरिक अखबारों में सुबह समाचार पढ़कर दिनभर की रुपरेखा तय करते हैं लेकिन २४ घंटे में भी ऐसा नहीं होता तो इन सूचनाओं पर विश्वास कम हो जाता है और फिर सूचना के अनुसार हो तो नागरिक परेशान हो जाते हैं। मुझे लगता है कि मौसम की सूचना तो दी जानी चाहिए मगर यह भी बताना चाहिए कि कौन से क्षेत्र में गर्मी या बारिश होगी तो आदमी जहां प्रभाव होगा वहां सुरक्षा के काम करे और बाकी अपने काम निपटाता रहे। ऐसी खबरों में मौसम का प्रभाव ना होने पर भी कुछ परिवार अपने बच्चों को बाहर निकलने से रोकते हैं और पैदल या दोपहिया वाहन चलाने से मना करते हैं। इससे रोजगार परिवार के हित और सरकारी योजनाएं प्रभावित हेाती है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सूचना दी जाए मगर कहां कहां प्रभाव होगा यह स्पष्ट होना चाहिए। कितनी बार देखा कि आधा किमी पर धूप है और सौ कदम दूर बारिश है। गर्मी में मौसम बदलते ही बीमारियां बढ़ जाती है। मौसम की सूचना समय उपयोगी है इसे गलत नहीं कहा जा सकता। नौतपा को न्यौता बनकर रह गया। अपनी गलत बातों को कोई यह कहकर सिद्ध करे कि गर्मी बढ़ी और लोग घरों से बाहर नहीं निकले।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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