देश को अनेकों आईएएस आईपीएस व प्रशासनिक अधिकारी देने वाले बिहार के नालंदा विवि को समय से सहायता देने वाले देशों से आर्थिक मदद पूर्ण रूप से ना आने के कारण कई कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षा में रुचि रखने वाले जानते हैँ कि नालंदा विवि का बड़ा नाम रहा है। इसलिए बीते दिनों भारत ने नालंदा में अंतरराष्ट्रीय शोध विद्यालय की स्थापना की जो बेहद सफल बताई जाती है। मगर भारत के १७ वैश्विक मददगार देशों में से मात्र पांच ने आर्थिक मदद दी। १२ ने अभी तक आर्थिक सहयोग प्रदान नहीं किया। जिससे पहले से ही साक्षरता को बढ़ावा देने में लगे हमारे देश पर इसका आर्थिक बोझ पड़ने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि हर व्यक्ति को उच्च शिक्षा प्राप्त कराकर देश के विकास में योगदान के योग्य बनाने के लिए केंद्र सरकार आदि पहले से ही बजट का बड़ा हिस्सा खर्च कर रही है। ऐेसे में १२ देशों की आर्थिक सहायता प्राप्त ना होने से इसके संचालन का पूरा भार हमारे देश पर ही आ पड़ा जबकि इंटर समिट के प्रस्ताव पर भारत ने नालंदा विवि की स्थापना के लिए संसद में कानून पारित किया था। स्मरण रहे कि नालंदा विवि पांचवी से १२ वीं सदी तक शिक्षा का वैश्विक केंद्र रहा जिसे ध्यान में रखते हुए यह पहल की गई। तब भारत के अलावा ईस्ट एशिया समिट के ४७ देश इसके संस्थापक भागीदार बने जिसमें उन्होंने सहयोग पर सहमति पर प्रकट की मगर मदद सिर्फ १२ देशों ने की। मुझे लगता है कि शिक्षा मंत्रालय को इस बारे में इसकी प्रस्तावना करने वाले देशों बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, मॉरीशस, न्यूजीलैंड, पूर्तगाल, सिंगापुर, श्रीलंका व वियतनाम आदि देशों के जनप्रतिनिधियों व अफसरों से संपर्क कर घोषित फंडिग कराई जाए और नए उपाय भी तलाशे जाएं तो ठीक है क्योंकि देश में बड़े उद्योगपति व व्यापारी शिक्षा के क्षेत्र में काफी रुचि ले रहे हैँ। इसलिए नालंदा विवि के संबंध में आ रही समस्या दूर की सकती है और इन्हें मदद मांगकर प्रस्ताव वाले ेदशों से भी संपर्क किया जाए तो यह समस्या दूर हो सकती है और नए अधिकारी भी पहले की तरह बिहार से निकलकर अपना योगदान कर सकते हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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