आस्कर पुरस्कार विजेता संगीतकार ए आर रहमान ने एक साक्षात्कार में कहा कि वह काम की तलाश में नहीं है लेकिन चाहते हैं कि काम उनकी योग्यता के आधार पर उनके पास आए। रहमान के अनुसार १९९० के दशक में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शुरुआत करने के दौरान भेदभाव का पता नहीं था। पर आठ सालों में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बदल गई है। एक खबर के अनुसार उन्होंने कहा कि आठ सालों में उन्हें बॉलीवुड में कम काम मिला। हो सकता है कि इंडस्ट्री में फैसले लेने वाले बदल गए हो। यहां तक सब ठीक है लेकिन उनके द्वारा यह कहा जाना कि यह सांप्रदायिक मुददा हो सकता है पर उन्होने कभी महसूस नहीं किया। सवाल उठता है कि जब महसूस नहीं किया तो आज सांप्रदायिकता से जोड़ने की इस मुददे की कोशिश क्यों की। ए आर रहमान आज भी सलमान, शाहरूख और आमिर खान आदि अभिनेताओं का डंका बजता है और काम की उनके पास कमी नहंीं है। वो दूसरों को काम दे रहे हैं। जहां सांप्रदायिक जैसे शब्द की गुंजाइश नजर नहीं आती। तो आपके साथ यह क्यों हो रहा है इसका मनन तो आपको खुद करना है कि आपकी काबिलियत और तरीके में कहां कमी रही जो आपको काम नहीं मिल रहा।
एक समय बड़े फिल्म अभिनेता प्राण ने इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म इंडस्ट्री में कभी अहम नहीं होना चाहिए क्योंकि यहां कब किसको काम मिलना शुरू और बंद हो जाए यह कोई नहीं बता सकता। इसलिए संयम बनाए रखना चाहिए। मुझे नहीं पता लेकिन जब आपको ऑस्कर मिला था कि कई लोगों का कहना था कि यह पुरस्कार आपने देश के मान सम्मान को नजरअंदाज कर प्राप्त करने का माहौल बनाया था। यह तो आप और कहने वाले ही जान सकते हैं लेकिन आप गायक रहे हैं इसलिए एक सलाह दे सकता हूं कि अपनी असफलता को छिपाने के लिए सांपद्रायिकता का मुददा उठाया जा रहा है इसे ठीक नहीं कह सकते। जैसा भी मिला है मगर आप जैसे ऑस्कर विजेता को इस तरह की बात करना ठीक नहीं है क्योंकि जो काम मिल रहा है वो भी बंद होने की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए संभल के बोलना और चलना सीखिए अगर व्यवस्था में बने रहना है तो।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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