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    Home»देश»सुरक्षाबलों का मनोबल बना रहे आम आदमी भी अपनी बात कह सके
    देश

    सुरक्षाबलों का मनोबल बना रहे आम आदमी भी अपनी बात कह सके

    adminBy adminJuly 23, 2026No Comments3 Views
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    लोकतंत्र में अपनी बात कहने और संविधान के तहत हर वो काम करने जिससे समाज में तनाव वैमनस्य ना हो। सदभाव को झटका ना लगे और भाईचारा बढ़े तथा देश की एकता और अखंडता मजबूत हो करने का अधिकार है।लेकिन यह भी जरुरी है कि आम आदमी को परेशानी ना हो कानून का पालन हो सके और सरकारी अफसरों व कर्मचारियों का समय विकास में लगे और बजट जनहित की नीतियों को पूरा करने में लगाया जाए। ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार नौकरशाह जनता और जनप्रतिनिधि एक ध्येय बनाकर चलें कि शांति बनी रहे। किसी का कोई काम प्रभावित ना हो और हम अपनी बात भी कह सके।
    ऊपर दिए गए बिंदुओं की तरफ इशारा करने का आश्य है कि सबको ऐसा काम करना चाहिए कि उनकी बात भी पूरी हो जाए और लोग परेशान ना हो। इस मामले में भारत रत्न डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान में हर किसी के अधिकारों और न्याय दिलाने की व्यवस्था की गई। लेकिन देखने में आ रहा है कि हर कोई उसे कहीं पैसे तो कहीं बाहुबल, जनसमूह के नाम पर उपयोग करने में लगा है। जिससे हर काम प्रभावित हो रहा है। इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है कि अधिकारी हो या नागरिक तब तक हर बात को टालते रहते हैं जब तक वह उग्र रुप ना ले ले। जब बात सीमा से आगे चली जाती है तो वो वह आसानी से सिमट नहीं पाती और यहीं से हर किसी की व्यवस्थाएं प्रभावित होने की शुरुआत हो जाती है। हम बात करें देश में किसी ना किसी मुददे को लेकर सब जगह पैदल मार्च धरना प्रदर्शन होते नजर आते हैं। जितना मैंने देखा इसके पीछे अफसर हो या जनप्रतिनिधि कोई व्यक्ति अपनी बात लेकर पहुंचता है तो उसकी फरियाद सुनी नहीं जाती। ज्यादा प्रयास करने पर न्याय दिलाने की बात कहकर टाल दिया जाता है। ऐेसेमें जब छोटी समस्या बड़ा आकार ले लेती है तब आंख खुलती है कि इसका इलाज कराया जाए कष्ट भी ना हो और ठीक हो जाए। ऐसा संभव नहीं हो पाता इसलिए कभी कभी छोटे छोटे आंदोलन समस्याओं को लेकर शुरू होते हैं। पहले चरण में ध्यान नहीं दिया जाता जैसा कि कॉकरोच जनता पार्टी के धरना प्रदर्शन को लेकर हुआ। लगभग एक माह तक जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और प्रभावी रूप से कोई मिलने भी नहीं पहुंचा। विपक्षी दल भी जो अब भूमिका निभा रहे हैं उन्होंने शुरू में नहीं निभाई और जब संसद के लिए मार्च शुरू हुआ तो केंद्रीय गृहमंत्री स्थिति पर निगाह लगाए रहे लेकिन यह अंदाजा नहीं लगा सके कि यह मार्च विकराल भी हो सकता है। परिणाम स्वरुप सरकार ने तो आंदोलन को उग्र होने की संभावना पर साम दाम दंड भेद की नीति नहीं अपनाई लेकिन ऐसे आंदोलनों की आड़ लेकर उपद्रव फैलाने वाले नहीं चूके। क्योंकि कॉकरोच जनता पार्टी का धरना एक दिन का नहीं था लेकिन लंबे समय तक भी अराजकता उसमें नहीं हुई लेकिन मार्च के दौरान जैसा हमेशा होता है कुछ बाहरी लोग घुस आते हैं और वो आंदोलन का उददेश्य ही समाप्त कर देते हैं और आयोजकों का नियंत्रण नहीं रहता और परिणाम वही हुआ जो होना था। कितने ही प्रदर्शनकारी और सुरक्षाकर्मी घायल हुए। अब विपक्षी दल सड़क पर भी और संसद में भी इसे लेकर प्रदर्शन कर अपनी बात रख रहे हैं। इनके कार्यकर्ता कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन करने वाले युवाओं को लेकर देश के ज्यादातर हिस्सो में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अब इसे शांत करने अथवा बढ़ने से रोकने के लिए पूरी ताकत सरकार लगा रही है। अन्य राजनीतिक दल अपने आप को आंदोलनकारी युवाओं का समर्थक दर्शाने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं। संसद मार्च के बाद फिर जंतर मंतर पर भीड़ जुटी और गत दिवस दो एसीपी सहित कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। सरकार भी अब आंदोलनकारियों से वार्ता को तैयार है। वो कह रहे हैं कि जब तक हमारी मांग मानने का आश्वासन नहीं दिया जाता तब तक क्या बात करनी। आंदोलनकारी नेता सोनम वांगचुक का कहना है कि जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अगर सरकार कार्रवाई ना करे तो वो आंदोलन समाप्त कर देंगे। नेता विपक्ष राहुल गांधी कह रहे हैँ कि १५२ बार पेपर लीक हुआ और ७.५ करोड़ छात्र प्रभावित हुए तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का कहना है कि कांग्रेस सरकारों में पेपर क्यों लीक हुए उनके बारे में भी चर्चा हो। जो भी हो मेरा कहना है कि चाहे आंदोलन कॉकरोच जनता पार्टी का हो या किसी नगर में हर प्रदर्शन और आंदोलन के लिए एक नीति नियम बनाए जाएं और जब भी उसकी अनुमति दी जाए तो उसके हिसाब से व्यूह रचना की जाए जिससे बाहरी व्यक्ति घुसकर उसे उग्र बनाने की कोशिश ना करे। आयोजकों को भी अपना मकसद प्राप्त करने के लिए टीम के सदस्यों की टुकड़िया बनाई जाए जो धरना प्रदर्शन में सक्रिय रहकर किसी को बाहर से आकर हंगामा मचाने की अनुमति ना दे और उनके कुछ करने से पहले उसे रोक दिया जाए। कुछ लोगों का यह कहनासही लगता है कि जिस प्रकार गृहमंत्री निगाह रख रहे थे अगर मार्च की शुुरुआत में कुछ लोगों को लगा दिया जाता तो हंगामा मचाने वाले अपनी योजना को अंजाम नहीं दे पाते और २० साल में पहली बार संसद तक पहुंचाने वाले प्रदर्शनकारी वहां तक नहीं पहुंच पाते। कहने का आश्यहै कि धरना प्रदर्शन के लिए बने नियमों का पालन कराने और शांति से पूरा कराने के लिए अलग से सुरक्षाबल व अधिकारियेां की टीम तैयार की जाए और प्रदर्शनकारियों का नियमों का उल्लंघन ना करने दें और करने पर कठोर कार्रवाई हो चाहे वह कोई भी हो । व्यवस्था बनाने वालों की लापरवाही पर वह बख्शे ना जाए। अगर ऐसा होता है तो मुझे लगता है कि आए दिन इन कारणों से सड़क जाम और लाठीचार्ज व पथराव होता है वो होने की नौबत ना आए। लगभग पांच दशक पूर्व जब मैं चौधरी चरणसिंह के नेतृत्व में सक्रिय था तो ऐसे कार्य मेरे द्वारा भी किए जाते थे। इसलिए मुझे मालूम है कि अगर आंदोलन का आहवानकर्ता मजबूत नहीं है और टीम का अभाव रहा तो आंदोलन नेतृत्व विहीन होते ही विकराल रुप ले लेता है। यह ताज्जुब की बात है कि जब हम हर क्षेत्र में तरक्की कर रहे हैं तो व्यवस्थाबनाने में सफल नहीं है क्योंकि उग्र प्रदर्शनकारी सुरक्षाबलों पर जब हमला करते हैं तो उनके खिलाफ सब एकजुट हो जाते हैं और जिस प्रकार मेरठ के एसएसपी सहित लगभग पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ वैसे कारणों से सुरक्षाबलों का मनोबल गिरता है। आंदोलन का मकसद सफल नहीं होगाऔर विध्वंसकारी सफल हो जाते हैं। गृह व कानून मंत्रालय जिस प्रकार औद्योगिक बल जैसे सुरक्षाबल बनाए हुए हैं धरना प्रदर्शन व आंदोलन के दौरान आम आदमी को परेशानी से बचाने के लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जाए। आवश्यकता पड़ने पर दोषियों को जेल भेजा जाए। अगर ऐसा होता है तो आम आदमी सही के साथ खड़ा नजर आएगा।
    जितना सुनने को मिलताहै उससे पता चलता है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो कानून व्यवस्था बनाने वाले अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बचते रहेंगे। आवाज उठाने वालेभी डरेंगे और हंगामा करने वालों के हौंसले बढ़ते जाएंगे तो नेताओं सरकार और अफसरों व जनता के लिए सही नहीं कहे जा सकते। मेरा मानना है कि सुरक्षाबलों का मनोबल बना रहे आम आदमी भी अपनी बात कह सके।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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