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    Home»देश»सिर्फ बाल श्रम निषेध दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं है, मुक्त कराये गये बच्चों और उनके अभिभावकों की समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा
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    सिर्फ बाल श्रम निषेध दिवस मनाने से कुछ होने वाला नहीं है, मुक्त कराये गये बच्चों और उनके अभिभावकों की समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा

    adminBy adminJune 12, 2026Updated:June 12, 2026No Comments8 Views
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    देश भर में बाल श्रम को लेकर हमेशा ही चर्चाएं चलती रहीं है और बाल श्रमिकों को मुक्त कराने की खबरें भी पढ़ने और सुनने को खूब मिलती रहीं हैं। श्रम विभाग और बाल श्रम रोकने में लगे अन्य संगठनों के लोग इस संदर्भ में बड़ी कामयाबी मिलने की बात भी कर रहे हैं पूर्व में इस काम में लगे सत्यार्थी को दुनिया का बड़ा पुरस्कार भी मिल चुका है हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी आज 12 जून को बाल श्रम दिवस मनाया जा रहा है कई जगह इसको लेकर जागरूकता अभियान भी चलने की खबर है। लेकिन आज तक यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 5 से 14 वर्ष के जिन बच्चों को बाल श्रम से मुक्त कराया गया अब उनकी स्थिति क्या है। क्योंकि सब कुछ होने के बावजूद भी बाल श्रम से मुक्त कराये गये बच्चों को लेकर काफी बड़े-बड़े दावे होते हैं लेकिन सही संख्या अगर कागजी आंकड़ों की बात छोड़ दें तो कभी भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती। और यह कोई बताने को तैयार नहीं होता कि जो बच्चे अभी तक मुक्त कराये गये थे उनकी स्थिति क्या है कितने बच्चे पढ़ रहे हैं और कितने पुनः बाल श्रम में चले गये। क्योंकि हम बाल श्रम रोकने और श्रम निषेध दिवस तो मनाते हैं लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि जो बच्चे काम करते हैं उनके परिवारों की स्थिति क्या है। कहा जा रहा है कि 14 साल से कम के बच्चों को मुक्त कराया जा रहा है और खबर है कि पांच साल तक के बच्चे भी किसी ना किसी काम में मजबूरी वश लगे हुए है मेरा मानना है कि जब तक बाल श्रम में लगे बच्चों के परिवारों और उनकी रोजी-रोटी और पढ़ने अथवा अन्य जरूरी चीजों की व्यवस्था धरातल पर नहीं की जाएगी तब तक मुझे तो लगता है कि बाल श्रम निषेध दिवस सालभर में एक दिन मनाने और इसे लेकर दावे करने तक ही सीमित होकर रह रहा है। मैं यह तो नहीं कहता कि जो प्रयास इस मामले में हो रहे हैं वह बिल्कुल ही गलत हैं।
    मुझे आज भी याद है कि जब मैं पांच साल के आसपास ही था तो बाजार में चाय की दुकान पर जूठे प्याले धोने और दिन में भट्टे की लेवर के साथ सहायक के रूप में काम करता था और वह कार्य मेरे द्वारा खुशी से नहीं मजबूरी वश किया जाता था। बाल श्रम की स्थिति का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि एक बार बारिश पड़ गयी और चाय वाले को कहीं जाना पड़ गया तब पांच दिन तक भूखे रहना पड़ा और जब स्थिति और खराब हो गयी तो जहां हम गांव में रहते थे वहां के इंटर कॉलेज में प्रोफेसर के परिवार ने आटा छानकर बूर बाहर फेंकी तो मैं उसे उठाकर कागज में घर ले गया और उसमें पानी और नमक मिलाकर गर्म करके पीने से भूख मिटानी पड़ी। यह सिर्फ इसलिए बता रहा हूं कि कुछ परिवारों में अभिभावक बीमार होते हैं इसलिए काम नहीं कर पाते तब उनके बच्चे ही परिवार का भरण-पोषण की व्यवस्था करते हैं। कहा जा रहा है कि विगत वर्षों की भांति दुनिया में बाल श्रम रोकने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल हुई हैं लेकिन फिर भी करोड़ों बच्चे बचपन को भूल मजबूरी वश समय से पहले बड़े हो गये। अंतरार्रष्ट्रीय श्रम संगठन यूनिसेफ 2025 की रिपोर्ट माने तो विश्व में लगभग 13.8 करोड़ बच्चे बाल श्रम में लगे हैं इनमें से 5.4 करोड़ बच्चे खतरनाक कार्यों में संलग्न है जानकारों का कहना है कि देश में प्रत्येक 12 बच्चों में से एक बच्चा श्रम के दुष्कर्म में फंसा हुआ है।
    जब कोई काम या योजना शुरू होती है तो उसका थोड़ा बहुत असर तो होता ही है इसलिए इस क्षेत्र में भी कुछ भाग्यवान बच्चे बाल मजदूरी से मुक्त हो चुके होंगे मगर यह विश्वास से कहा जा सकता है कि अभी तक मनमाफिक सफलता तो दूर इस क्षेत्र में आंशिक सफलता भी अगर जमीन पर गली मोहल्लों में सर्वे करा कर देखा जाये तो प्राप्त नहीं हो पायी है। श्रम विभाग और इस क्षेत्र में लगे संगठन तो दावे करते ही है पुलिस विभाग भी कई बार बच्चों को मुक्त कराने का संदेश आम आदमी तक पहुंचाने के लिए खबरों के माध्यम से प्रयास करता है। जहां तक मैं समझता हूं कि अभी इस मामले में ईमानदार प्रयास की बड़ी आवश्यकता है और ग्रामीण कहावत जिसके पैर ना पड़ी विवाई वह क्या जाने पीड़ पराई। इसलिए मुझे लगता है कि पहले बाल श्रम में लगे परिवारों की स्थिति पर ध्यान दिया जाये और फिर उनके बच्चों को श्रम से मुक्त कराने के अभियान चलें। अगर अभिभावक को काम मिलने लगा तो कोई भी अपने बच्चों को श्रम कराने की बात नहीं सोचेगा। वर्तमान में भी ऐसी अनेक किस्से मिल जाएंगे कि घरों में झाड़ू लगाने और सफाई के काम में लगे बच्चें काम के साथ-साथ पढ़कर बड़ी बड़ी प्रशासनिक व्यवस्थाओं में कामयाब हो गये इसलिए हर क्षेत्र में जागरूकता की आवश्यकता है इसलिए बड़ी-बड़ी कोठियों में कूलर और एसी की हवाओं में बैठ चाय के प्यालों की खनखनाहट में बैठकर नीतियां बनाने या आलीशान बंगलों में रहने वालों के प्रयास से बाल श्रम रूकने वाला नहीं है।
    मैं किसी की आलोचना तो नहीं कर रहा हूं मैंने जो भुगता और देखा उसके हिसाब से जो सही तस्वीर है वह सबके सामने लाने की कोशिश है जो सभी के प्रयासों से सही हो सकती है वर्ना बाल श्रम कर अपना और अपने परिवारों को भरण पोषण कर रहे है उन्हंे बालश्रम से मुक्त कराकर जहां भेजा जाता है वहां उनकी स्थिति और भी बदतर हो जाती है। पिछले दिनों एक समाचार पढ़ने को मिला कि ऐसे स्थानों पर रहने वाले बच्चो का यौन शोषण हो रहा था और उनसे जानवरों की तरह काम कराया जाता है। फिर एक खबर पढ़ी की एक बाल श्रम के बच्चें ने सिपाही की हत्या कर दी। वह स्थिति तक विद्रोह ही क्यों हुआ इसका भी पता लगाना बहुत जरूरी है क्योंकि कहीं उनकी ऐसी काउंसलिंग तो होती नहीं कि उन्हंे क्या समस्या है बस बाल श्रम से इतने बच्चे मुक्त कराये या जागरूकता हेतु भरी गर्मियों में रैलियां निकलवाकर कोई लाभ होने वाला नहीं है यह बात सही है कि बाल श्रम समाज पर धब्बा है और इस क्षेत्र में खप रहा बचपन जागरूकता और बयानों से मिटने वाला नहीं है यह कलंक तभी समाप्त हो सकता है जब हम सभी प्रकार से ईमानदार कोशिश इस मामले में करें नाम और फोटो छपवाने और आंकड़े पेश करने से बाल श्रम की सार्थकता और उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
    (प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाईम्स मेरठ)

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