कोलकाता, 05 मई (ता)। पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार का बनना किसी एक चुनाव, एक चेहरे या एक रणनीति का परिणाम नहीं है। यह एक दीर्घकालिक राजनीतिक साधना का निष्कर्ष है। जहां संगठन की गहराई, नेतृत्व की व्यापकता और चुनावी प्रबंधन की सूक्ष्मता एक साथ मिलकर काम करती है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, पूर्व अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे नेताओं की अभूतपूर्व भूमिकाओं के साथ ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय जैसे कई नेताओं का योगदान भी रहा। यह जीत भाजपा के एक ऐसे मॉडल की सफलता है, जिसमें संगठन को केंद्र में रखकर नेतृत्व और रणनीति को उसके इर्द-गिर्द विकसित किया गया। भाजपा के यहां पर प्रभावशाली होने में मध्य प्रदेश के भाजपा संगठन और नेताओं की भी भागीदारी महत्वपूर्ण रही है।
एक समय ऐसा था जब पश्चिम बंगाल में भाजपा की उपस्थिति नाममात्र की थी। पार्टी न तो राजनीतिक विमर्श में प्रभावी थी और न ही संगठनात्मक रूप से मजबूत। ऐसे समय में मध्य प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय को बंगाल का प्रभार सौंपा गया। कैलाश विजयवर्गीय उस वक्त भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव थे तब उन्हें बंगाल का प्रभारी बनाया गया था। उन्होंने यहां चुनावी जीत को लक्ष्य बनाने से पहले संगठन को खड़ा करने पर जोर दिया। यह समझना जरूरी है कि बिना संगठन के कोई भी राजनीतिक दल केवल अवसरों का लाभ उठा सकता है, लेकिन स्थायी विस्तार नहीं कर सकता। विजयवर्गीय ने इसी बुनियादी सत्य को आधार बनाकर काम शुरू किया। उन्होंने मध्यप्रदेश में सफल रहे पन्ना प्रभारी मॉडल को बंगाल में लागू किया। मतदाता सूची के हर पन्ने को एक कार्यकर्ता से जोड़ना, यह रणनीति केवल आंकड़ों का प्रबंधन नहीं, बल्कि मतदाता के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने का प्रयास थी। इसके साथ ही बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत किया गया और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट जिम्मेदारियां दी गईं। यह काम आसान नहीं था। बंगाल की राजनीतिक परिस्थितियां अक्सर हिंसक और तनावपूर्ण रही हैं। विजयवर्गीय को भी विरोध, हमलों और पुलिस के मामलों का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने पीछे हटने के बजाय संगठन को और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया। इसका परिणाम भी सामने आया। भाजपा जहां 2016 के चुनाव में 3 सीटों पर थी वह 2021 में बढ़कर 77 सीटों तक पहुंची। यह भाजपा के लिए एक मजबूत राजनीतिक आधार का निर्माण था।
विजयवर्गीय द्वारा खड़ा किया गया संगठन केवल चुनावी मशीनरी नहीं था, बल्कि एक जीवंत तंत्र था। बाद में परिस्थिति बदली और विजयवर्गीय केंद्रीय संगठन से वापस मध्य प्रदेश की राजनीति में भेजे गए लेकिन उनका बंगाल में तैयार किया गया तंत्र समय के साथ और विकसित हुआ। पन्ना प्रभारी के साथ-साथ गली प्रमुख जैसी व्यवस्थाएं जोड़कर संगठन को और सूक्ष्म स्तर तक पहुंचाया गया। इसका मतलब यह था कि भाजपा अब केवल बड़े मुद्दों पर नहीं, बल्कि हर गली, हर मोहल्ले और हर परिवार तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थी। यह वही कार्यशैली थी, जिसने मध्यप्रदेश में भाजपा को लगातार मजबूती दी है।
बंगाल में भाजपा की जीत को राष्ट्रीय नेतृत्व से अलग करके नहीं देखा जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों के जरिए एक व्यापक संदेश दिया। जिसमें विकास, राष्ट्रीय पहचान और राजनीतिक स्थिरता जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे संगठनात्मक स्तर पर लागू किया। उनकी रणनीति बूथ स्तर तक केंद्रित रही। जहां हर वोट की गणना और हर कार्यकर्ता की भूमिका तय की गई। उन्होंने चुनाव को केवल प्रचार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक सुसंगठित अभियान में बदला। उन्होंने दोनों चरणों की वोटिंग के दौरान वहां पर अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क में रहकर यह बताया कि भाजपा किसी भी मोर्चे को हल्के रूप में नहीं ले रही है। नए नवेले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन जैसे नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया में बेहतरीन समन्वयक की भूमिका निभाई। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि शीर्ष नेतृत्व की रणनीति और जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत के बीच कोई अंतराल न रहे। इस सबके साथ बंगाल के भाजपा नेता और कार्यकर्ताओं का भी अभूतपूर्व योगदान और लंबे अरसे का संघर्ष भी इस जीत का मजबूत आधार बना।
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