बोलने और संविधान में दिए गए अधिकार के तहत कार्य करने का देश में सबको अधिकार है। लेकिन ताकत के जोर में किसी से मारपीट करना सही नहीं है। बेलडांगा पंचायत समिति के कार्यकारी निदेशक और जनता उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायुं कबीर के बड़े बेटे गुलाम नबी आजाद की गिरफ्तारी को लेकर माहौल तो गरमा ही रहा है। एक खबर के अनुसार इसे हुमायुं कबीर द्वारा राजनीतिक प्रतिशोध बताते हुए कहा जा रहा है कि जुम्मा खान और उनके बीच उस समय तीखी बहस हुई थी। फिलहाल हुमायुं कबीर के अंगरक्षक से मारपीट का मामला छोड़ भी दिया जाए तो पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में जनता उन्नयन पार्टी के गठन से पूर्व टीएमसी से निलंबित हुमायुं कबीर आजकल मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं और उनके द्वारा जो निर्माण का बीड़ा उठाया जा रहा है उसे लेकर मीडिया ज्यादा उत्साहित नजर आता है। बीते शुक्रवार को वहां जुटी भीड़ और लोग लेकर आए ईटों को लेकर मीडिया ने खूब चर्चा की और नाम सोशल मीडिया का दिया जाता रहा।
ध्यान देकर सोचें तो तृणमूल पार्टी से विधायक के निलंबन का यह पहला मुददा नहीं है। पहले भी निलंबित सांसद या विधायक नई पार्टी बना चुके हैं। कुछ दिनों मीडिया की सुर्खियों में बने रहे और धीरे धीरे पानी के बुलबुले के समान गुम होते रहे। मैं हुमायुं कबीर के धार्मिक स्थल के निर्माण के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता लेकिन जो देखा उससे कह सकता हूं जो दावे किए जा रहे हैं ऐसा होगा वो नहीं लगता। क्येांकि जिस तरह प्रचारित किया जा रहा है उससे यह आभास होता है कि वो ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को राजनीतिक नुकसान पहुंचाने के साथ साथ अन्य दलों के समर्थकों की संख्या को प्रभावित कर सकते हैं। वैसे तो कभ्ीा भी कुछ भी हो सकता है लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई बड़ा करिश्मा दिखाकर अपने दम पर हुमायुं कबीर कुछ कर पाएंगे। बीच में ऐसी चर्चाएं भी चली कि वो असददुदीन औवेशी के साथ मिलकर अगला चुनाव लड़ सकते हैं या किसी और पार्टी में संपर्क कर अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश करेंगे। तो यही कहा जा सकता है कि ममता बनर्जी को वो कोई बड़ा नुकसान पहुंचाएंगे ऐसा लगता नहीं है। कई लोगों का कहना है कि मुस्लिम मतदाता उनके साथ जुट जाएंगे और इसका आधार बीते शुक्रवार को आए लोगों को देखकर बताया जा रहा है। देशभर में इनसे भी बड़े अनेक नेता है जो अकेले या राजनीतिक दलों के साथ मिलकर समाज की भलाई के लिए काम कर रहे हैं लेकिन फिर भी वह पूरे समाज को अपने साथ लाने में सफल नहीं है तो हुमायुं कबीर में ऐसी कौन सी खासियत है। चर्चाओं से पता चलता है कि हुमायुं कबीर की चर्चा कुछ दिन उफान पर रहेगी और फिर कुछ अंगरक्षक को पीटने जैसी घटनाओं को लेकर किे समर्थकों का यह भ्रम टूट सकता है कि वो समाज को साथ लेकर चल पाएंगे।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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