रिश्वतखोरी और लापरवाही जहां तक दिखाई दे रहा है बड़े स्तर तक आम आदमी के रोजमर्रा के काम का हिस्सा बन गई है। कुछ साल पहले एक खबर पढ़ी कि दुनिया के कुछ देशों में यही कारण प्रगति का माध्यम है और इससे खुशहाली भी आ रही है। मगर जिस व्यक्ति को देनी पड़ती है वो तो खुश क्यों होगा और जो लेता है उसकी खुशी समझी जा सकती है। यह भी सवाल है कि जो दे रहा है वो किसी ना किसी कारण से तो दे ही रहा होगा और जब अपना काम जल्दी कराने की कोशिश है तो गाड़ी में पहिये लगाने पड़ेंगे यह कोई नई बात नहीं है। आज एक मीडियाकर्मी ने लिखा कि खाकी पर लगे भ्रष्टाचार के दाग कैसे होंगे साफ । साथ ही उसने तीन प्रकरण छापे। दारोगा प्रकाश चंद्र २० हजार की रिश्वत लेते गिरफ्तार, इंस्पेक्टर महेंद्र कुमार चार लाख की रिश्वत लेते गिरफ्तार और दरोगा छेत्रपाल सिंह १० हजार की रिश्वत लेते गिरफ्तार। कोई पूछे कि यह तीन मामले छापे अच्छा है लेकिन देशभर में जो लोग नियमविरुद्ध लोन ले रहे हैँ और बाद में देश छोड़कर भाग रहे हैं उन पर लिखते तो ज्यादा असर पड़ता। मैं पुलिस का समर्थक नहीं हूं लेकिन जन्म से लेकर मरण तक पुलिस की दखल दिखाई दी इसलिए मुझे लगता है कि अन्य विभागों के मुकाबले पुलिस में भ्रष्टाचार कम है। क्योंकि जैसा लोग बताते हैं किसी ने दस हजार लिए किसी ने २० हजार। नागरिकों के अनुसार अन्य विभागों में तो इससे कई गुना रिश्वत ली जाती है। ऐसा कोई विभाग नहीं जिसमें भ्रष्टाचार ना हो। १६ घंटे काम करने वाले पुलिसवालों के दाग कैसे छूटेंगे तो यह क्यों नहीं सोचा कि इन्हें भी छ़ुटिटयां, खाने पीने और रहने के स्थान होने चाहिए। मैंने देखा कि दारोगा भी अपनी तैनाती के स्थान पर बच्चों को नहीं ला पाते और अकेले रहते हैं। आराम की भी व्यवस्था नहीं होती। कहने का मतलब है कि भ्रष्टाचार एक रुपये का हो या एक करोड़ का उसे सजा मिलनी चाहिए लेकिन यह भी देखा जाना चाहिए कि और विभागों में क्या हो रहा है। फिल्म का एक गाना पहले पत्थर वो मारे जिसने पाप ना किया हो इसलिए किसी एक दारोगा के रिश्वत लेने पर खाकी पर दाग को नहीं जोड़ना चाहिए। जानकार कहते हैँ कि दस मछलिया ही देश में सुधार और व्यवस्थाओं को लागू करने में लगी है। ९० तो ऐसे ही किसी मामले में फंसे होंगे। हाल ही मैं लखनऊ और दिल्ली में आग की घटनाएं हुई। उनमें खाकी तो दोषी नहीं होती और जिनके कारण यह जानें जा रही हैं उनके दाग क्यों नहीं उभारे जाते। पहली बार लखनऊ प्रकरण में आईएएस और पीसीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है वरना तो ज्यादातर छोटे मामलों में भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर इन्हें ही बलि का बकरा बनाया जाता है।यह नहीं देखता कोई कि रिश्वत देने वाले की मंशा क्या थी।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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