नई दिल्ली, 28 अप्रैल (ता)। सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर कथित यौन उत्पीड़न करने के मामले में अपने पूर्व श्लिव-इनश् साथी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द किए जाने को चुनौती देने वाली एक महिला से गत दिवस सवाल किया कि जब संबंध सहमति से बना हो तो अपराध का सवाल ही कहां उठता है। महिला ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि महिला उस व्यक्ति के साथ रहती थी और उससे उसका एक बच्चा भी है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि जब आपसी सहमति से संबंध बना हो तो अपराध का सवाल ही कहां उठता है? वे साथ रह रहे थे और उसका (महिला का) उससे एक बच्चा भी है। दोनों की शादी नहीं हुई और अब, वह कह रही कि यौन उत्पीड़न किया गया। 15 साल तक वे साथ रहे। महिला के वकील ने न्यायालय में दलील दी कि उसके पति की पहले ही मौत हो चुकी थी और उसके करीबी रिश्तेदार ने उसे आरोपी से मिलवाया था। न्यायालय को यह भी बताया गया कि आरोपी ने उससे शादी का वादा किया था और उसका यौन शोषण किया।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने पूछा कि वह शादी से पहले उसके साथ क्यों रहने लगी? उन्होंने कहा कि वह उसके साथ रहती थी। उससे उसका एक बच्चा भी है। वह उसे छोड़कर चला जाता है क्योंकि शादी का कोई बंधन नहीं है। कोई कानूनी बंधन नहीं है। वह छोड़कर चला जाता है, लिव-इन रिलेशनशिप में यही जोखिम होता है। इसलिए, जब वह छोड़कर चला गया है, तो यह अपराध का मामला नहीं बनता। महिला के वकील ने दलील दी कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसने यह बात छिपाई थी।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि देखिए, अगर शादी हुई होती, तो उसके (महिला के) पास अधिकार होते। वह (आरोपी की) दो शादियों को लेकर मुकदमा दायर कर सकती थी। वह गुजारा भत्ता के लिए मुकदमा कर सकती थी। उसे राहत मिल जाती। अब चूंकि शादी ही नहीं हुई है, वे साथ रहते हैं, यह जोखिम है। वे किसी भी दिन अलग हो सकते हैं। हम क्या करें? उन्होंने सुझाव दिया कि महिला बच्चे के लिए भरण-पोषण खर्च जैसे उपाय का सहारा ले सकती है। उन्होंने पक्षकारों से मध्यस्थता की प्रक्रिया में जाने को कहा।
अगर वह जेल भी चला जाता है, तो उसे (महिला को) क्या मिलेगा? हम बच्चे के लिए कुछ भरण-पोषण खर्च के बारे में सोच सकते हैं। बच्चा अब सात साल का है। कम से कम, बच्चे के लिए कुछ वित्तीय सहायता तो दी ही जा सकती है। न्यायालय ने इस मामले में नोटिस जारी किया और पक्षकारों से यह पता लगाने को कहा कि क्या याचिकाकर्ता और आरोपी के बीच कोई समझौता हो सकता है।
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