अगर राजनीतिक दलों की चर्चा करें तो मुख्य रुप से देश में कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, रालोद जैसे कुछ पांच छह दर्जन दल होंगे जो कहीं ना कहीं अपना अस्तित्व बनाए रखते होंगे। लेकिन फिलहाल वर्ष २०२५ में ३४५ गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत राजनीतिक दलों के पंजीकरण खत्म किए जाने के बाद भी देश में लगभग २५०० गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल बचे बताए जाते हैं। स्थिति यह है कि २०२६ में अभी छह माह बीते हैं लेकिन अब तक नए २१ दल पंजीकरण के लिए आवेदन कर चुके हैं। सियासी दल इतनी बड़ी तादात में क्यों गठित किए जाते हैँ तो जवाब है कि बड़े दलों के साथ चुनाव में उनके सहयोगी के रुप में चुनाव लड़ने या उनका समर्थन करने की एवज में जहां तक चर्चा सुनी जाती है किसी दल के कुछ लोगों को पद तो कुछ को एक दो क्षेत्रोंसे चुनाव लड़ाने का मौका मिल जाता है। या फिर बिल्ली के भाग छीका टूटने के समान बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में हुई टूट के बाद अचानक चर्चा में आई नेशनललिस्ट सिटीजनस पार्टी आफ इंडिया रातो रात भाजपा का सबसे बड़ा घटक दल बन गई। ममता बनर्जी की टीएमसी से सांसद बने नेताओं ने बंगाल में ममता बनर्जी को मिली हार और भाजपा सरकार बनने के बाद जो टूट हुई उसके काफी सांसद अलग हो गए और अपनी पार्टी एनसीपीआई बना ली। वरना सम्मेलन या आंदोलन कर लिया या धरना प्रदर्शन तक में ही यह राजनीतिक दल अपना अस्तित्व अपने जिले और अन्य तो कुछ जगहों पर अपना अस्तित्व बनाए रखते हैं। वरना एक समय में केंद्र में शक्ति संतुलन और यूपी में सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी का जानकार कहते हैं कि कई बार सीएम रह चुकी मायावती की पार्टी में यूपी में एक विधायक है और वह बहुमत नहीं है जो हमेशा रहा है। फिर भी हर माह तीन राजनीतिक दलों के रुप में पंजीकृत करने की आ रही खबरों से पता चलता है कि कुछ ना कुछ जरुर है जो इतने लोग एनजीओ या संस्थाएं चलाने के बजाय राजनीतिक दल पंजीकृत कराते हैं। कई लोगों का यह कहना है कि यह बड़े दलों के लिए मोहरे का काम करते हैं क्योंकि बड़ी पार्टिया अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए विपक्षी दल के प्रत्याशी की जाति का उम्मीदवार उनमें से उतार देते हैं। कभी ऐसा जीता हो यह तो नहीं कह सकते लेकिन वोट कटने से बड़े दल के उम्मीदवारों को फायदा जरुर पहुंच जाता है। ऐसा नहीं कि निर्दलीय चुनाव नहीं जीतते। मगर आम आदमी की इस बात से मैं सहमत हूं कि राजनीतिक दलों के पंजीकरण के लिए बनी नियमावली में अब कुछ और सुधार होना चाहिए। क्योंकि अगर कोई राजनीतिक दल के रुप में पंजीकृत हो गया तो उसका हिसाब किताब रखने के संदर्भ में जो कार्रवाई होती है उस पर समय और पैसा दोनों ही खर्च होते हैं। जैसे जैसे जागरुका और चुनाव प्रणाली में सुधार हो रहा है वैसे ही दलों के पंजीकरण के लिए निर्वाचन आयेाग को बदलाव करने की आवश्यकता है। जितना पता चलता है भारत के चुनाव आयोग द्वारा वर्तमान में 6 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं । इन पार्टियों में भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), नेशनल पीपुल्स पार्टी हैं।
वहीं क्षेत्रीय पार्टियों में समाजवादी पार्टी, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस, जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईडीएमके), शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व तेलुगु देशम पार्टी और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी, भारत राष्ट्र समिति, शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल आदि प्रमुख हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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