प्रयागराज, 25 मार्च (जा)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि जब आरोपित और पीड़िता आपस में विवाह कर चुके हों और सुखद वैवाहिक जीवन जी रहे हों तो उनके बीच के पुराने विवादों को खींचने और आपराधिक ट्रायल को जारी रखने का कोई कानूनी अथवा व्यावहारिक औचित्य नहीं रह जाता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ ने मुरादाबाद जिले के थाना भोजपुर में दर्ज नाबालिग से दुष्कर्म की आपराधिक कार्यवाही रद कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब मुख्य गवाह ही अभियोजन का समर्थन नहीं करेंगे तो ट्रायल चलाना केवल समय की बर्बादी होगी। पीड़िता के पिता ने 20 मई 2020 को आरोपित के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। पुलिस ने तीन जून 2020 को चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी। मामला स्पेशल जज (पाक्सो एक्ट), मुरादाबाद की अदालत में लंबित था। सुनवाई के दौरान कहा गया कि आरोपित और पीड़िता एक ही गांव के थे और उनके बीच प्रेम संबंध था। चूंकि उस समय दोनों नाबालिग थे, इसलिए वे शादी नहीं कर सके। हालांकि बाद में नौ जुलाई 2022 को
दोनों ने विवाह कर लिया और 29 अक्टूबर 2022 को उनके विवाह का पंजीकरण भी हो गया। वर्तमान में दोनों पति- पत्नी के रूप में साथ रह रहे हैं। इस बीच, पीड़िता के पिता (शिकायतकर्ता) और आरोपित के बीच समझौता हो गया, जिसे ट्रायल कोर्ट ने तीन जनवरी 2026 को सत्यापित भी कर दिया।
हालांकि सरकारी वकील ने यह कहते हुए याचिका का विरोध किया कि दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराधों में समझौता नहीं किया जा सकता, लेकिन हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया। कोर्ट ने के. धंडापानी बनाम राज्य मामले का उल्लेख किया, जिसमें शीर्ष अदालत ने कहा था कि अदालतें जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकतीं और किसी के खुशहाल परिवार को उजाड़ना न्यायोचित नहीं है।
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