मुंबई, 13 जून (ता)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने घरेलू नौकरानी के साथ छेड़छाड़ के आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे पारंपरिक समाज में, परिवारों को यौन उत्पीड़न और दुर्व्यवहार के मामलों की रिपोर्ट करने में कठिनाई होती है। इसके साथ ही एफआईआर दर्ज करने में देरी के कारण ऐसे मामलों को खारिज नहीं किया जा सकता है। न्यायमूर्ति रणजीतसिंह भोंसले की एकल पीठ ने गत दिवस अपने आदेश में केरल के 58 वर्षीय एक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपने घरेलू सहायक की गरिमा को कथित रूप से ठेस पहुंचाने के आरोप में 2019 में उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी। शिकायत के मुताबिक, पीड़िता 10 मार्च, 2019 को काम के सिलसिले में आरोपी के घर गई थी, जहां उसने कथित तौर पर उसके साथ छेड़छाड़ की। महिला किसी तरह वहां से भाग निकली और फिर उसने अपने पति को इस घटना की जानकारी दी। इसके बाद महिला के पति ने सोसायटी के सदस्यों को घटना की जानकारी दी। महिला ने 2 अप्रैल को आरोपी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर एफआईआर दर्ज की गई।
अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में अपनी याचिका में इस देरी पर सवाल उठाया और कहा कि उसे उस महिला और उसके पति ने झूठा फंसाया है, जिन्होंने उससे पैसे की मांग की थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि कथित घटना वाले दिन के सीसीटीवी फुटेज में महिला को शांत और संयमित तरीके से इमारत से बाहर निकलते हुए दिखाया गया है। हालांकि, उच्च न्यायालय ने दोनों दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही कहा कि पहले नजर में आरोपी के खिलाफ मामला बनता है। न्यायालय ने टिप्पणी दुर्भाग्य से, हमारे जैसे पारंपरिक समाज में, कई परिवारों को इस तरह के अपराधों के मामलों में वास्तविक आपराधिक मुकदमा शुरू करना भी बेहद मुश्किल लगता है। ऐसे मामलों में केवल देरी ही आपराधिक अभियोजन को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती।
न्यायाधीश ने कहा कि मेरी राय में, महिलाओं के खिलाफ अपराधों और इसी तरह के मामलों में, आपराधिक अभियोजन को केवल अस्पष्ट देरी के आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि देरी किसी दुर्भावना, व्यक्तिगत प्रतिशोध या बदले की भावना से प्रेरित न हो, जो पहली नजर में सिद्ध हो।
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