जैसे जैसे दुनिया में पठन पाठन के क्षेत्र में आधुनिक सुविधाएं और सोशल मीडिया मंचों पर किताबे पढ़ने को मिलने लगी है ऐसे में कई लोग यह रोना रोते हैं कि अब किताबों में पढ़ने वाले प्रेरणादायक शब्द अवलोकन करने को कुछ समय बाद नहीं मिल पाएंगे। मैं पढ़ा लिखा और विद्वान तो हूं नहीं लेकिन जागरुकता और सोच पर किसी का अधिकार नहीं होता इसलिए दुनिया कितनी आधुनिक क्यों ना हो जाए और इंटरनेट पर कितना पढ़ने और देखने को मिलने लगे लेकिन जो आत्मिक शांति आज भी पुस्तक पढ़कर मिलती है वो शायद कभी भी और साधनों पर उपलब्ध नहीं हो पाएगी। जैसे जैसे सोच निखरती है और नए विषय समाज में उभरकर सामने आते हैं तो व्यंग्य कहानी कविता आलेख सभी विद्याओ में रचनात्मक बदलाव होते हैं इन समयकालीन बदलते साहित्य को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए। आजकल कुछ लोग आंसू भर भरकर सोशल मीडिया को कोस रहे हैं कि उसने पठन पाठन की शक्ति को कम किया है। युवा वर्ग अब किताबे पढ़ने की बजाय इस पर ज्यादा ध्यान दे रहा है। मेरा मानना है कि यह सोशल मीडिया का ही प्रभाव है कि आज प्रमुख भाषाओं के साथ साथ क्षेत्रीय भाषा का भी विस्तार हो रहा है और उनकी दुनियाभर में पहचान हो रही है। गुजरात के लोग जहां भी मिलेंगे आवश्यकता पड़ने पर गुजराती का खूब उपयोग करेंगे ऐसे ही हर क्षेत्र की भाषा को पढ़ने सुनने वाले सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से उसमें बढ़ोत्तरी तो कर सकते हैं लेकिन बचपन की यादों को नहीं भूल सकते। इसलिए किताबों का जादू कभी भी फीका नहीं पड़ने वाला। २०२४ तक भारत का प्रिंट बाजार ८०,००० करोड़ रुपये का हो चुका था जिसमें ७१ प्रतिशत हिस्सेदारी शैक्षिक किताबों की थी। जानकारी का मानना है कि ६.३० फीसदी सालाना वृद्धि के साथ २०३३ में १७ अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। इसके उदाहरण के रुप में अब प्राइमरी से उच्च शिक्षा तक की किताबों को छापने वाले प्रकाशकों को देख सकते हैं। इन पुस्तकों को छापने वालों में कई ऐसे है जो पहले कुछ हजार की नौकरी करते थे और आज करोडों के मालिक होगए हैं। आज बच्चों को सही ज्ञान दिलाने के लिए अभिभावक अपने बच्चों को कई सौ रुपये की किताबें उपलब्ध करा रहे हैं। इसलिए कह सकते हैं कि समाज के निर्माण में साहित्य के मौलिक योगदान सजग प्रहरी होता है। आप देखिए दुनिया में कई ऐसे लेखक है जो अपने लेखन से अरबपति हो गए हैं। वो बात दूसरी है कि किताबे अब इंटरनेट पर भी पढ़ी जाने लगी है। इसलिए कह सकते कि किताबें पढ़ने की जिज्ञासा बढ़ी है बस उसका तरीका बदल गया है। कई किताबों पर सीरियल बन रहे हैं। लेखक और किताबों का नाम हो रहा है। इस कारण मैं यह जरुर कह सकता हूं कि समाचार पत्र भी एक प्रकार से साहित्य का दर्पण और समाज का चेहरा है। मैं कई घंटे इनका अवलोकन करता हूं। अगर कहीं कहानी छपी मिल जाए तो पढ़ने तक छोडता नहीं हूं।
यह बड़े फक्र के साथ कहता हूं जो शब्द ज्ञान मुझे अनपढ़ होने के बाद भी है वो वेदप्रकाश रिेतुराज जैन, ओमप्रकाश शर्मा, विक्रांत सीरीज के जो उपन्यास पांच दशक पूर्व पढ़ने से हुआ। आज कहानीकार और साहित्यकार सामने आए हैं और युवा पीढी उनके साहित्य को खूब पढ़ रही है। विश्व पुस्तक दिवस पर सिर्फ यही कहा जा सकता है कि कितनी भी क्रांति समाज में आ जाए लेकिन कहानी साहित्य और जानकारियों का विस्तार मिलता है वो कहीं नहीं मिल सकता। वैसे भी पिं्रट की विश्वनीयता काफी मानी जाती है क्योंकि सोशल मीडिया का लेखन बदल सकता है लेकिन जो छप गया वो बदल नहीं सकता। इसलिए सभी लेखकों और पाठकों को शुभकामनाएं कि इस क्षेत्र को ंिजंदा रखने में सहयेाग करें। पुस्तक और साहित्य अमर है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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