आए दिन मीडिया में पढ़ने सुनने को मिलता है कि दारोगा शादी में डांस कर रहे थे सस्पेंड कर दिए गए। फलाना अधिकारी बस में सफर कर रहा था उसके खिलाफ हुई कार्रवाई। आज एक खबर पढ़ने को मिली कि दिल्ली-देहरादून इकॉनॉमिक कॉरिडोर की मांग को लेकर गांगनौली गांव में किसानों के धरने का एक वीडियो सामने आया है जिसमें दोघट थाने का एक कांस्टेबिल मंच से अपनी चॢचत रागनी मैंने बहू बदल दी चार गाता व नाचता दिखाई दिया। बताते हैं कि इसके लिए उसे लाइन हाजिर कर दिया गया। सीओ बड़ौत की संस्तुति पर कार्रवाई हुई। देश में सबको आचरण अपनाने की बड़ी आवश्यकता है लेकिन अगर बस में सफर कर रहा पुलिसकर्मी या अधिकारी अपने पद का रौब झाड़ता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई जरुरी है। शादी में दारोगा नाच रहे थे या हेड कांस्टेबिल ने रागिनी गाई तो इसमें आखिर हर्ज क्या है। मैंने देखा है बड़े कार्यक्रमों में पुलिस प्रशासनिक अधिकारी गाने भी गाते हैं और डांस भी करते हैं। शायद इस बात से रागिनी गाने या समारोह में डांस करने वाले भी अनभिज्ञ नहीं होंगे क्योंकि होली पर पुलिस लाइन में जिसको जो आता है वह अपने हुनर का प्रस्तुतिकरण करता है। बात लगभग ३० साल पुरानी है। सीओ स्तर के अधिकारी को अपने साले की शादी में जिले से १०० किमी दूर जाना था। शादी वाले दिन उसकी छुटटी मंजूर हुई। अब कोई यह बताए कि वह १०० किमी जाएगा तो तीन चार घंटे लगेगे ही। साले की बारात चढ़ रही थी अगर वह घर जाकर कपड़े बदलता तो देर हो जाती। इसलिए वह वर्दी में ही शामिल हो गया और रिश्तेदार डांस के लिए खींच ले तो ऐसी परिस्थिति या रागिनी सुनाने के लिए सजा क्यों। आए दिन सुनने को मिलता है कि बड़े बड़े अफसर पुलिस पब्लिक भाई भाई की बात पर जोर देते हैंं और अब नागरिकों से अपराध रोकने या जानकारी लेने के लिए संबंधों में मधुरता और अंदर तक घुसपैठ जरुरी है। मैं व्यवस्था का विरोधी नहीं हूं लेकिन हेड कांस्टेबिल ने रागिनी गाई तो यह बड़ा अपराध नहीं है और अगर है तो अन्य कानूनों की तरह इसमें भी बदलाव होने चाहिए क्योंकि देश में अंग्रेजी शासन की तरह व्यवस्था नहीं संभाली जा सकती और नागरिकों का उत्पीड़न कर जानकारी नहीं ली जा सकती। इसलिए यह जरुरी है कि १२ घंटे से ज्यादा काम करने वाले पुलिसकर्मियों से किसी कारणवश किसी समारोह में गाना गाते हैं और नृत्य करते हैं तो उसे लेकर लाइन हाजिर निलंबन की कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। क्योंकि वरिष्ठ अधिकारी कम फोर्स की बात कहने से नहीं चूकते। कम फोर्स से ही काम लेना होता है और सिपाही या दारोगा को आज भी उतनी सुविधाएं नहीं है जितनी पारिवारिक व्यवस्थाओं में होती है। अफसरों की डांट और जनता का रोष के तनाव में कहीं कोई पुलिसकर्मी वर्दी में भी समय की मांग अनुसार ऐसा निर्णय लेता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई मेरी निगाह में तो नहीं होनी चाहिए। बाकी नियमों के हिसाब से काम होना चाहिए लेकिन समयानुकूल निर्णय का भी ध्यान रखा जाना जरुरी है समाजहित में।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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