लखनऊ, 06 मई (ता)। प्रदेश के कई जिलों में इस बार आलू की भरपूर पैदावार किसानों के लिए वरदान नहीं बल्कि अभिशाप बन गई है। “सब्जी का राजा” कहलाने वाला आलू किसानों को रुला रहा है। मंडियों में कीमत इतनी गिर गई है कि किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रहे। हालात यह हैं कि कहीं आलू खुले खेतों में पड़ा है तो कहीं कोल्ड स्टोर के बाहर धूप में सड़ रहा है, जिससे किसानों के सपने चकनाचूर हो रहे हैं। हरदोई से लेकर रामगंगा के कछार तक का इलाका इस संकट की गवाही दे रहा है। जैनापुर गांव के किसान शिवबरन सिंह बताते हैं कि कोल्ड स्टोर में जगह नहीं बची और मंडी में भाव सिर्फ 300 से 500 रुपये प्रति क्विंटल है। इसी फसल के सहारे वह अपने मकान की छत डलवाना चाहते थे, लेकिन अब यह सपना अधूरा रह गया। आसपास के इलाकों, खासकर मोहम्मदाबाद और नगला रायसिंह के किसानों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।
कन्नौज और उसके आसपास के इलाकों में भी हालात बेहद खराब हैं। किसान आरके यादव और मो. अदीब जैसे कई किसानों का कहना है कि कोल्ड स्टोर पूरी तरह भर चुके हैं और बचा हुआ आलू खेतों या सड़कों किनारे रखना पड़ रहा है। अदीब बताते हैं कि उनके बेटे की इंजीनियरिंग की पढ़ाई की फीस अब कर्ज लेकर भरनी पड़ेगी, क्योंकि आलू से उम्मीद के मुताबिक आमदनी नहीं हुई।
आलू बेल्ट के रूप में पहचाने जाने वाले कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, फिरोजाबाद, मैनपुरी, आगरा, अलीगढ़ और हाथरस सहित कई जिलों में करीब 2363 कोल्ड स्टोर पहले ही भर चुके हैं। लगभग 172 लाख मीट्रिक टन आलू स्टोर किया जा चुका है, जबकि बचा हुआ आलू औने-पौने दामों पर मंडियों में बेचना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि लागत और बिक्री मूल्य में भारी अंतर इस संकट की जड़ है। एक बीघा आलू की खेती में 12 से 15 हजार रुपये तक खर्च आता है, जबकि बिक्री से मुश्किल से 10-12 हजार रुपये ही मिल पाते हैं। कोल्ड स्टोर संचालकों का कहना है कि अगर आलू का निर्यात बढ़े या आलू पाउडर जैसी प्रोसेसिंग यूनिट्स लगाई जाएं तो किसानों को राहत मिल सकती है। फिलहाल, किसान सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं ताकि उन्हें इस आर्थिक संकट से बाहर निकाला जा सके।
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