हम में से ज्यादातर की प्रवृति हमेशा से रही है कि जब भी कोई नया काम हो तो उसका विरोध जरुर करना है। यह बात किसी एक मामले में लागू नहीं होती क्योंकि मैंने देखा कि पड़ोस में नया व्यक्ति रहने आता है तो कई समस्याएं होती है। शुरु में उसकी कमियां ढूंढने का कोई मौका नहीं छोड़ा जाता। ऐसा ही सोशल मीडिया मंचों को लेकर हो रहा है। अब एआई जिसे पीएम मोदी सहित दुनियाभर के नेता और नागरिक मान्यता देने और उसमें सुधार करने का प्रयास कर रहे हैं तो कई लोग इसमें भी बुराई ढूंढने में पीछे नहीं है। २००७ में चार मार्च को एस्टोनिया में पहला देशव्यापी इंटरनेट चुनाव कराया गया जिसमें घर बैठे ऑनलाइन वोट डालने की सुविधा मिली थी लेकिन वोट शुरुआती दौर में ३.४ फीसदी ही पड़े थे। आगे वर्षों में यह संख्या ४४ फीसदी हो गई जिससे कह सकते हैं कि और भी बढ़ोत्तरी हो सकती है। उक्त इंटरनेट वोटिंग मुख्य चुनाव से पहले २६ से २८ फरवरी के बीच आयोजित की गई थी। अपने देश में ईवीएम से हो रही वोटिंग में भी कई कमियां निकाली जा रही है जबकि इसमें कमियां निकालने वाले खुद भी जीत रहे हैं लेकिन हार होने पर ईवीएम में कमियां गिनाई जाने लगी। मुझे लगता है कि हम बात को समझने से पहले ही उसके विरोध का मन बना लेते हैं। यही सोच बुराई और विरोध करने का कारण बनती है। मुझे लगता है कि कम खर्चीले चुनाव कराने के लिए पैसे को बचाएं और आपसी विवाद से मनमुटाव को दूर करने के लिए भारत निर्वाचन आयोग एस्टोनिया में हुए २००७ के इंटरनेट के जरिए चुनाव को ध्यान में रखते हुए देश में इंटरनेट के माध्यम से मतदाताओं को घर बैठे वोट डालने की सुविधा उपलब्ध कराए। हो सकता है कि कुछ नकारात्मक सोच वाले जो नोटा का बटन दबाते हैं या अन्य विरोधी शुरु में इस व्यवस्था को विवादों में घेरने की कोशिश करे लेकिन जिस प्रकार एस्टोनिया में दूसरे चुनाव में ४४ फीसदी मतदान पहुंच गया था अपने देश में भी यह व्यवस्था लोकप्रिय हो सकती है। अभी देश में ७० प्रतिशत मतदान ही हो पाता है। ऐसे में इंटरनेट व्यवस्था से घर बैठे अगर मतदान होता है तो ७० प्रतिशत मतदान का आंकड़ा बनाकर रख ही सकते हैं। इससे जहां आम आदमी को कई प्रकार के लाभ होंगे वहीं कई चरणों में चुनाव कराने पर जो जन और धन शक्ति खर्च होती है उसकी बचत होगी जिसे देखकर यह कह सकते हैं कि जो रुपया चुनाव में अब खर्च हो रहा है उसमें ७५ प्रतिशत की बचत होगी और वो पैसेा देश के विकास पर खर्च करने के साथ ही बढ़ते अपराधों पर रोक लगाने के लिए सुरक्षा बल काबू पा सकते हैं। कभी कभी कुछ मामलों में जो सेना की सेवाएं लेने की संभावना रहती है वो भी समाप्त होगी और सुरक्षा बल आवश्यकता पड़ने पर आंतरिक सुरक्षा के साथ साथ सीमाओं की सुरक्षा में सेना के जवानों को अपना सहयोग दे सकते हैँ। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि इंटरनेट से घर बैठे मतदान आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत पर खरे उतरते हैं। हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा होए के समान कम लागत में पारदर्शी रुप से शांति से मतदान होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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