डिजिटल साइबर ठगी का मामला समाचारों में बना ही रहता है। विभिन्न प्रकार के डर दिखाकर हाउस अरेस्ट कर कभी बैंक खातों को खाली करने की कोशिशों की खबरें पढ़ने को मिलती है। ऐसा नहंीं है कि सरकार और संबंधित विभाग इन्हें रोकने के लिए कुछ ना कर रहे हो मगर अभी तक कोई सकारात्मक सफलता नहीं मिल पा रही है इसलिए यह समस्या बढ़ती ही जा रही है। रिजर्व बैंक द्वारा इस मामले में तीन गाइडलाइन जारी की गई है।
इस बारे में क्या क्या अहतियात करना है वो भी नागरिकों की जानकारी में लाए जाएंगे मगर परेशानी यह है कि डिजिटल ठगी से नुकसान पर ग्राहकों को मात्र २५ हजार रुपये का मुआवजा ऊंट के मुंह में जीरे वाली कहावत के समान है। गरीब आदमी से यह ठगी होती नहीं और मध्यम दर्जे के लोग इनकी चपेट में आसानी से नहीं आ पाता है। बड़े लोग ज्यादातर इनके शिकार बनते हैं जिन्हें 25 हजार रुपये देकर उनके नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती। इस बारे में नियम बनाने वाले समझ लें कि ठगी के शिकार व्यक्ति का अनकहे रूप से मुंह बंद करने का जो यह प्रयास है उसे सफलता मिलने वाली नहीं है। रिजर्व बैंक के अफसर इस योजना को साकार रुप देने में लगे हैं मेरा मानना है कि उन्हें आधुनिक उपाय अपनाकर ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए जो डिजिटल ठगी और डिजिटल अरेस्ट के मामलों की बढ़ोत्तरी को रोका जा सके। तभी आम आदमी को राहत मिल सकती है। २५ हजार का मुआवजा इस ठगी के शिकार लोगों के लिए कोई महत्व नहीं रखता है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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