गायों का समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनाओं से जुड़ा स्थान है। इसीलिए उन्हें गौमाता के संबोधन से पुकारा जाता है। आजाद देश में गौहत्या बंद होने की मांग हमेशा होती रही है। इस बारे में प्रयास चल रहे बताए जाते हैं। वो पूर्ण रूप से कब कामयाब होंगे वो बात और है। पिछले कुछ सालों से नागरिकों की भावनाओं का आदर करते हुए गौ संरक्षण, उनके चारे और ठंड से बचाने की व्यवस्था के तहत जगह जगह गौशालाओं को इसके लिए अनुकूल बनाने के कई निर्णय लिए गए हैं। लेकिन यह कहने में कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा है कि केंद्र व प्रदेश सरकार इस बारे में सभी सुविधाएं संबंधित विभागों को उपलब्ध करा रही है। मेरठ के डीएम डॉ वीके सिंह जैसे कुछ अधिकारियों द्वारा उन्हें लागू करने के प्रयास किए जा रहे हैं मगर जैसा नजर आता है जब तक पूर्ण रूप से सब जिम्मेदार मिलकर इस बारे में प्रयास नहीं करेंगे तब तक बयानबाजी और दावे तो खूब होते रहेंगे लेकिन साकार रूप से यह योजनाएं सड़क पर उतरती नजर नहीं आ रही है।
क्योंकि सुबह से शाम तक कई स्थानों पर गाय सड़क पर घूमती नुकसानदेय सामान खाती नजर आती है। जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। क्येांकि सरकार जितने प्रयास कर रही है अगर वो लागू हो जाएं और सड़कों पर गौपालक दूध निकालकर उन्हें ना छोड़ें तो गौसंरक्षण के मामले में उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। कुछ साल पहले एक खबर पढ़ने को मिली कि गायों को सनील के कंबल या गर्म कपड़े पहनाएं जाएंगे जिसके बाद अयोध्या में एक गौशााल में सनील का कंबल ओढ़े गाय की फोटो छपी। मीडिया में लेकिन उसके बाद कोई खबर पता नहीं चली। इस बारे में देशभर में गाय पालने और संरक्षण के लिए गौशाला के अच्छे रखरखाव की योजना बनाई गई और इनमें गायों को चारा उपलबध कराने और सफाई के आदेश दिए गए। कई कुछ दिनों पहले गौशालाओं में गौवंशों की मौत और बीमार होने की खबरों से पता चला कि कागजी आंकड़ेबाजी तो खूब हो रही है लेकिन वह जमीन पर क्यों नहीं उतर पा रही। यह पालन कराने करने वाले ही जान सकते हैं।
गौशालाओं में रखरखाव सही है या नहीं सीसीटीवी कैमरे भी इसके लिए लगाए गए। कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई गई मगर परिणाम वही ढाक के तीन पात ही लगभग नजर आ रहे हैं। अब उप्र के पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने आदेश दिए गए हैं कि ठंड से गौवंश को बचाने के लिए बोरो की झूल उन्हें ओढ़ाई जाएगी जिससे गौवंश की ठंड से मौत ना हो। इसके अलावा जिलास्तर पर भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं लेकिन सवाल है कि डीएम और अन्य अधिकारी हर समय गौशालाओं पर नजर नहीं रख सकते। हर आदेश और निर्देश देेने से पहले जिम्मेदार अफसरों को जवाबदेह बनाना होगा। कहीं कमी पाई जाती है तो दोषियों को ऐसी सजा मिले जिससे और सबक ले सके। जो भी हो जब प्रयास हो रहे हैँ तो फायदा भी जरूर गौवंशों को होगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता।
मेरा मानना है कि अगर हम जितना बजट और ताकत सरकारी स्तर पर गौवंशों को संरक्षित करने के लिए लगा रहे हैं इतना धन और सहयोग ग्रामीणों को उपलब्ध करा दें तो शायद ८० प्रतिशत गौवंश सुरक्षित होने के साथ ही पौष्टिक आहार भी उन्हें प्राप्त होने लगेगा क्योंकि ग्रमीणों की भवनाओं से गौवंश जुड़े रहते हैं और चारे की कोई कमी नहीं रहती। साथ ही गुड़ भी उपलब्ध कराते हैं। दूसरी तरफ जो शहर में दूध विक्रेता गौपालक है उनकी गणना कराकर देखा जाए कि उनके यहां कितने पशु है और समय समय पर निगरानी की जाए तो यह दूध निकालने के बाद सड़क पर उन्हें नहीं छोड़ पाएंगे। इससे आवारा पशुओं के कारण होने वाले दुर्घटनाएं रूकेगी और चारा अच्छा मिलने से दूध की गुणवत्ता सुधरेगी।
लगभग पांच दशक पूर्व तक के नैनीताल और अब के उधमसिंहनगर के मौहल्ला कानूनगोयान में निवास करने वाले मास्टर सतप्रकाश बिश्नोई के यहां गरीबी के चलते गर्म कपड़े ना होने से लगभग चार माह की सर्दियां मेरे द्वारा उनके यहां पलने वाली दो गायों की देखभाल और उसी में रात्रि विश्राम करके गुजारी गई। इस दौरान रजाई बिछौना ना होने से ठंड से बचने के लिए बोरे और टाट में पुराल भरकर उसे रजाई व बिछौने के रूप में इस्तेमाल करने से मुझे यह पता है कि बोरे में काफी गर्मी होती है और उसकी झूल बना दी जाए तो जानवर को ठंड नहीं लगती। वह जानवरों को गुड़ भूसा खल खिलाते थे तो दूध भी अच्छा मिलता था। इसे देखते हुए डेरी संचालकों की निगरानी की जाए और गौशाला संचालकों को प्रोत्साहित किया जाए तो जो काम अधिकारी नहीं कर पा रहे हैं वो धार्मिक भावना से जुडते ही गौशाला संचालक और धर्म के आधार पर सोचने वाली जनता गायों को ठंड से बचाने अैर अच्छा चारा देने की जिम्मेदारी उठाने में सफल हो सकती है। बस ईमानदार धार्मिक टच दिखाने की आवश्यकता है क्येांकि हर अफसर इसके प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
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