नई दिल्ली, 04 जुलाई (ता)। भारतीय समाज में बदलते पारिवारिक और सामाजिक ढांचे को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गत दिवस लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। उच्चतम न्यायालय ने लिव इन पार्टनर को अपने साथी या उसके परिजनों द्वारा उत्पीडन के मामले में पत्नी वाला अधिकार दिया है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए, जो अब तक पति या उसके परिजनों द्वारा क्रूरता के मामलों में लागू होती थी, उसका लाभ अब उन महिलाओं को भी मिलेगा, जो ऐसे लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसे रिश्ते में महिला के साथ क्रूरता या उत्पीडऩ किया जाता है, तो संबंधित पुरुष के खिलाफ धारा 498ए के तहत आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है। हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि यह राहत हर लिव-इन रिलेशनशिप पर स्वतः लागू नहीं होगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि केवल वही लिव-इन संबंध इस दायरे में आएंगे, जिन्हें कानून की दृष्टि में ‘रिलेशनशिप इन द नेचर ऑफ मैरिज’ माना जा सकता है यानी ऐसा संबंध, जिसमें दोनों पक्ष बालिग हों, अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हों और उनके रिश्ते में विवाह जैसा स्थायित्व, प्रतिबद्धता और विवाह का स्पष्ट इरादा दिखाई देता हो। बता दें कि आईपीसी की धारा 498ए के तहत पति या पति के परिजनों और रिश्तेदारों द्वारा पत्नी या घर की महिला के साथ क्रूरता करने पर तीन साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।
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