पलामू 03 अगस्त। झारखंड का कुख्यात गैंगस्टर सुजीत सिन्हा रविवार देर रात पुलिस एनकाउंटर में मारा गया. पुलिस के अनुसार, जेल में बंद रहने के बावजूद वह अपने गिरोह का संचालन करता रहा और विभिन्न आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए नेटवर्क सक्रिय रखता था.
पुलिस के अनुसार, उसे साहिबगंज मंडल कारा से धनबाद जेल शिफ्ट किया जा रहा था. रास्ते में जामताड़ा जिले के सदर थाना क्षेत्र स्थित सुपायडीह हाईवे पर कैदी वाहन पंचर हो गया. इसके बाद कड़ी सुरक्षा के बीच उसे दूसरे वाहन में शिफ्ट किया जा रहा था.
इसी दौरान सुजीत सिन्हा ने कथित तौर पर एक पुलिसकर्मी का हथियार छीन लिया और भागने का प्रयास किया. पुलिस का दावा है कि उसने पुलिस टीम पर फायरिंग की कोशिश की, जिसके जवाब में पुलिस ने कार्रवाई की. जवाबी फायरिंग में सुजीत सिन्हा मौके पर ही मारा गया. घटना के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई.
करीब 20 साल तक अपराध की दुनिया में सक्रिय रहे 42 वर्षीय सुजीत का नाम लोगों के लिए खौफ का दूसरा नाम बन चुका था। उसकी उम्र से भी दोगुने केस उसके खिलाफ दर्ज थे।
जिनमें हत्या, रंगदारी, बमबाजी और टेंडर विवाद जैसे संगीन अपराध शामिल थे। अकेले पलामू में ही उस पर 40 से ज्यादा मामले दर्ज थे। हर बड़ी वारदात के बाद पुलिस की गाड़ियां उसके घर के बाहर नजर आती थीं और यही कारण था कि धीरे-धीरे उसका परिवार भी उससे दूर होता चला गया। कभी जिस घर में वह रहता था, वही घर पुलिस की छापेमारी का केंद्र बन गया और अंततः उसके अपने ही लोग उससे किनारा कर गए।
पलामू जिले के हुसैनाबाद थाना क्षेत्र के पथरा गांव का रहने वाला सुजीत बाद में मेदिनीनगर के श्रीराम पथ इलाके में बस गया था, लेकिन उसका बढ़ता अपराध परिवार पर भारी पड़ने लगा। लगातार छापेमारी और पूछताछ से परेशान होकर उसकी मां, भाई और बहन ने मेदिनीनगर छोड़ दिया और रायपुर में जाकर रहने लगे।
उसकी पत्नी रिया सिन्हा भी आपराधिक मामलों में जेल में बंद है। इस तरह सुजीत का निजी जीवन पूरी तरह बिखर गया था। वह अकेला पड़ता गया और अपराध ही उसकी पहचान बन गया। पुलिस रिकॉर्ड में उसका नाम एक ऐसे अपराधी के तौर पर दर्ज था, जिसने डर के जरिए अपना वर्चस्व कायम किया। इलाके के व्यवसायियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक को निशाना बनाया।
सुजीत सिन्हा के अपराध की शुरुआत 2005 में हुई। उसने सेवा सदन इलाके में एक मामूली विवाद के बाद उसने रिक्शा चालक कृष्णा साव की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह घटना उसके अपराधी बनने की पहली सीढ़ी साबित हुई। इसके बाद उसने रंगदारी का नेटवर्क खड़ा किया। दिनदहाड़े बमबाजी जैसी वारदातों को अंजाम देकर इलाके में दहशत फैला दी।
साल 2007 में मेदिनीनगर के कांदु मुहल्ले में टेंडर विवाद के दौरान दो सगे भाइयों की हत्या ने उसे अपराध जगत में कुख्यात बना दिया। इस दोहरे हत्याकांड के बाद उसे आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई गई, लेकिन उसके नेटवर्क का खात्मा नहीं हुआ।
मूल रूप से झारखंड के पलामू जिले का रहने वाला सुजीत सिन्हा राज्य के सबसे कुख्यात अपराधियों में गिना जाता था. उसके खिलाफ हत्या, रंगदारी, आगजनी, धमकी, अवैध वसूली और संगठित अपराध समेत 75 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे. उसका नेटवर्क झारखंड के आधा दर्जन से अधिक जिलों तक फैला हुआ था और व्यापारी वर्ग के बीच उसका नाम आतंक का पर्याय माना जाता था.
सुरक्षा कारणों से सुजीत सिन्हा को एक दर्जन से अधिक बार झारखंड की अलग-अलग जेलों में शिफ्ट किया जा चुका था. पुलिस का मानना था कि वह जेल के भीतर से भी अपने नेटवर्क को संचालित करने में सक्षम था.

